Sunday, 3 December 2017

ईस्ट एंड - एनरिके विला-मतास

कैसा अनुभव होता है एक फिल्म देखना? क्या फिल्म (और दूसरी कलायें भी) हमें कई बार खुद के सामने ही नहीं ला खड़ा करतीं और ऐसे सवालों से रूबरू करातीं जिनसे हम बचते ही रहते हैं? कला अब एक नए आयाम पर आ पहुंची है| कला धीरे-धीरे सूक्ष्मता की ओर जा रही है| सिनेमा की दुनिया में, बहुत सारे फिल्मकारों ने तमाम तरह के प्रयोग किए हैं और सिनेमा की संभावनाओं को एकदम खोलकर रख दिया है| डेविड क्रोनेनबर्ग ऐसे ही एक आधुनिक फिल्मकार हैं लेकिन हम उन पुराने महान फिल्मकारों को कैसे भूल सकते हैं जिहोने चली आ रही परिपाटी से अलग सोचने का साहस किया और सिनेमा के तौर-तरीके बदल कर रख दिया! इन्हीं फिल्मकारों में से एक हैं - माइकलएंजेलो अंतोनियोनी| प्रस्तुत लघु कथा में, स्पेनिश कथाकार एनरिके विला-मतास इन्हीं दो फिल्मकारों के सहारे मनुष्य की पहचान, संवेदनशील मनुष्य और रूढ़िगत विश्व के बीच के सम्बन्ध और कलाओं तथा उनसे कला-रसिक के संबंधो की पड़ताल करते हैं| विला-मतास एक उत्तर आधुनिक कथाकार हैं और उन्होंने भी अपने तरीके से कथाकारी के तौर-तरीकों में भरपूर प्रयोग किया है| इस तरह का फिक्शन जहाँ आप यह अनुमान नहीं लगा सकते कि प्रस्तुत कथा, कोई कथा है या सत्य घटना.. कथा है या आलोचना.. यहाँ पर कला और यथार्थ के बीच की लाइन थोड़ी और धुंधली सी हो गयी है और कहन के नए आयाम खुले हैं- जिसे नाम दिया गया मेटा फिक्शन| तो लीजिये प्रस्तुत है विला-मतास की लघु कथा ईस्ट एंड, जिसका स्पेनिश से अंग्रेजी अनुवाद किया है सामंता श्नी ने और अंग्रेजी पर आधारित हिंदी अनुवाद आदित्य शुक्ल| 

ईस्ट एंड

बेल, डेविड क्रोनेनबर्ग की उस फिल्म की सीडी किराए पर ले आई है जो एकमात्र फिल्म मैंने नहीं देखी| यह फिल्म ‘एक एकाकी मनुष्य और रूढ़िगत विश्व के बीच की संवादहीनता’ पर आधारित है| पहले दृश्य में, मकड़ी युवक, जो कि नायक है, ट्रेन से उतरने वाला आखिरी यात्री, उसे देखते ही हम यह अंदाजा लगा लेते हैं कि वह दूसरे यात्रियों से भिन्न है| वह कुछ तो अन्यमनस्क सा है, एक छोटा और अजीब-सा सूटकेस हाथ में लिए हुए उतरते हुए लडखडाता है| वह आकर्षक है, लेकिन यह तो स्पष्ट है कि वह मानसिक स्तर पर विचलित है, एक अकेला आदमी इस उदासीन विश्व से कटा हुआ| बेल जानना चाहती है अगर मैंने इस बात पर ध्यान दिया हो कि गर्मी का मौसम होते हुए भी मकड़ी ने चार शर्ट पहने हुए हैं| असल में मैंने ध्यान नहीं दिया था| मैंने उससे माफ़ी मांगते हुए बताया कि मैं अब तक उस फिल्म पर ध्यान केन्द्रित नहीं कर पाया हूँ| और वैसे भी मैं इतनी महीनता से फ़िल्में नहीं देखता| लेकिन यह सच है| उसने कडाके की गर्मी में भी चार शर्ट पहने हुए हैं| और उसका सूटकेस? सूटकेस छोटा और पुराना है और उसमें कुछ व्यर्थ के सामानों के साथ एक छोटा नोटबुक है जिसमें वह बहुत बारीक अक्षरों में कुछ लिखता है|
बेल मुझसे पूछती है कि मकड़ी क्या लिख रहा है और पूछती है अगर मैंने इस बात पर ध्यान दिया हो कि ईस्ट एंड की उदास सड़कों पर मकड़ी के अलावे कोई नहीं है| असल में, जबसे फिल्म शुरू हुई है, बेल ने मुझसे सवाल पूछना बंद ही नहीं किया हैं|

‘तुमसे किसी ने यह पता करने को कहा है क्या कि मैं अब भी सारी दुनिया से एक व्यापक संवाद स्थापित कर सकता हूँ?’ मैंने उससे पूछा|  

बेल ने कोई जवाब नहीं दिया| मकड़ी सुनता हुआ प्रतीत हो रहा था, जैसे हमारी बातों को भी कनखियों से सुन रहा हो, यहं तक कि मेरे विचारों को भी| क्या मैं मकड़ी हूँ? मैं उसे कैमरे की ओर देखते हुए, अपना सूटकेस बंद करते हुए, और उदास निर्जन सडक पर चलते देखता हूँ| वह ऐसा व्यवहार कर रहा है जैसे हमारे कमरे में आ गया हो| वह ऐसे चल रहा है मानो लन्दन की सडकें बस यहीं घर के बाहर ही हों| मकड़ी एक मानसिक अस्पताल से निकलकर सैद्धांतिक रूप से एक बेहतर जगह, किसी घर या मनोचिकित्सा संसथान में जा रहा है, लन्दन की उन्हीं गलियों में जहाँ संयोग से उसका बचपन भी बीता था और जहाँ पर वह अपने बीती स्मृतियों का घातक पुनर्निर्माण करेगा| जिस समय मकड़ी अपने अतीत का पुनर्निर्माण कर रहा था मैं इस बात पर विचार कर रहा था क्या मनुष्य का जटिल मानसिक जीवन कभी भी बचपन की गलियों से मुक्त हो पाता है?

‘पागल लोग अजीब होते हैं’, बेल ने कहा| ‘लेकिन दिलचस्प होते हैं, तुम्हें ऐसा नहीं लगता?’

मुझे फिर से लगा कि वह यह जानना चाहती है कि मैं मकड़ी के बारे में क्या सोच रहा हूँ, जिससे वह मेरे पागलपन की तीव्रता का अंदाजा लगा सके| यह फिल्म एक मानसिक यात्रा है, ईस्ट एंड से होकर गुजरते हुए एक क्षतिग्रस्त आदमी की यात्रा| यहाँ हम जीवन को मकड़ी के अनुभव से देख रहे हैं, इस युवक, जिसके हाथ में एक अजीब सी सूटकेस और सूक्ष्म अक्षरों में लिखी हुई नोटबुक है, के दयनीय मानसिक ढ़ांचे पर लगे हुए फिल्टर से|
‘क्या तुमने ध्यान दिया वह अपनी नोटबुक में क्या लिख रहा है?’ बेल ने अगला सवाल किया|
अगर मैं घर पर अकेले मकड़ी फिल्म को देख रहा होता, तो पृष्ठभूमि में बॉब डिलन का गीत ‘मोस्ट लाइकली यू गो योर वे’ लगा लेता जो मुझे हमेशा ही सुकून देता है|

‘मैंने सिर्फ नोटबुक देखा है|’ मैंने जवाब दिया|

बेल ने फिल्म को रोक दिया ताकि हम देख सकें कि मकड़ी नोटबुक में क्या लिख रहा है| वे कुछ रहस्यात्मक सी बनावटें हैं, लकड़ी या टूथपिक, टुडे-मुड़े अधूरे से जो स्केच जैसे भी नहीं हैं, और स्वभावतः वे किसी भी वर्णमाला या चित्रलिपि का भी हिस्सा नहीं लगते| वे डरावने हैं| आप उन्हें कैसे भी देखें, ये लिखावट पागलपन की व्यर्थता का सम्पूर्ण खांका खींच देती हैं जिससे मुझे भय लगता है| शायद हम सबमें मकड़ी का कुछ हिस्सा होता हो| कभी-कभी मुझे मकड़ी से लगाव महसूस होता है जो मुझे एल देजर्तो रोस्सो की याद दिलाता है, १९६४ में माइकलेंजेलो अंतोनियोनी की बनाई वह फिल्म जिसमें मोनिका विट्टी एक भगोड़े का रोल अदा करती है, मकड़ी का स्त्री रूप, औद्योगिक इलाके में खोयी हुई एक औरत जो अपने आस-पास से कोई सम्बन्ध नहीं बना पा रही है|

मेरी दृष्टि में, स्पाइडर फिल्म एक रहस्यात्मक सन्दर्भ का माहौल बनाता है, खासकर पीटर सुचित्ज्की की सिनेमाटोग्राफी में, बहुत हद तक एल देजर्तो रोस्सो की शैली में| और ठीक उसी फिल्म की तरह, ऐसा जान पड़ता है कि विश्व के साथ संवाद स्थापित करने का हर प्रयास व्यक्तिगत पहचान को निर्धारित न कर पाने की अयोग्यता से पनपती है| क्या मैं मकड़ी हूँ? फिल्म के सबसे यादगार दृश्य में, मकड़ी अपने कमरे में जाले बुनता है, एक मानसिक मकडजाल जो उसके मस्तिष्क की भयानक कार्यशैली को दर्शाता है| बहरहाल, अपनी पहचान को निर्धारित करने की कठिन प्रक्रिया भी व्यर्थ ही साबित होती है| वह ईस्ट एंड की जड़ गलियों से होकर गुजरता है, अपने खोए हुए बचपन के ठंडे पुराने रास्ते से: विश्व के साथ उसके हर तरह के ताल्लुक टूट चुके हैं|

क्या मैं मकड़ी हूँ? मैं जिस पीड़ा का अनुभव करता हूँ वह मुझे अपने बचपन की स्मृतियों के भयंकर इलाके में ला पटकता है, एक ऐसी जगह जहाँ मैं खुद को सदैव प्यार करता रह सकता हूँ| लेकिन आखिरी वक्त में मैं यहाँ से भी पलायन कर जाता हूँ, एल देजर्तो रोस्सो में मोनिका विट्टी की कही गयी पंक्ति के सहारे, एक पंक्ति जो मेरे ईस्ट एंड जितनी ही खतरनाक है|

‘मेरे बाल मुझे तकलीफ दे रहे हैं|’


मैं भी अभी यही कह सकता हूँ| मकड़ी भी कहेगा| मकड़ी, जो जीवन में खोया हुआ भटक रहा है, नहीं जानता कि वो वह सब कुछ कर सकता है जो मैंने किया है, अपनी पहचान को दूसरे लोगों की स्मृतियों के सहारे पुनर्जीवित कर सकता है, वह एक अनोखी आवाज़ बन सकता है, एक बहुमुखी व्यक्तित्व और बंजारी प्रवृत्तियों वाला चरित्र बन सकता है| क्या मैं मकड़ी हूँ? मैं सिर्फ इतना जानता हूँ कि गर्मी का बदबूदार मौसम आ चुका है, और जैसा कि वह हमेशा करती है, बेल ऐसा व्यवहार कर रही है जैसे वह वह सब कुछ जानती हो जो मैं कर रहा हूँ – जो कह रहा हूँ, जो खा रहा हूँ, जो सोच रहा हूँ जो देख रहा हूँ जो पी रहा हूँ, सब कुछ – वह सब कुछ जो मैं खुद को उस खतरनाक उपनगर में खो देने के लिए कर रहा हूँ| 

Sunday, 30 July 2017

क्या जरूरी - शैलेन्द्र साहू


क्या ज़रुरी
कि मैं ऐसा लिखूँ
जिसमे दुनिया के आँसू हों
पडोसी के बीवी का दुःख हो
अरसा पहले मर गए बाप का अफ़सोस हो
और अपने अब तक नहीं किये पापों के लिए खुशी
(जिन्हें ज़रूर कभी करूँगा)

अरे नहीं छूती मुझे औरों कि तकलीफें
माफ करता हूँ मैं खुद को
खुद ही

क्या ज़रुरी
कि जंगल का मतलब
हमेशा हरियाली हो
और मैं
अपने अंदर के कुँए में डूबते हुए
समंदर का सपना
देखूँ
दिखाऊँ

क्या ज़रुरी
कि मेरे हाथ में हमेशा एक
फटा हुआ झंडा हो
(पोंछा मारने वाले कपड़े का)
कि मैं हमेशा ऐसा कुछ कहूँ
जिसका कोई मतलब ना हो
और लोग ताली पीटते हुए हलकान हो जाएँ
कि जैसे कितनी सुन्दर बात कही है
आओ तुम्हे गले लगाऊँ
तुम्ही सँवारोगे इस जहन्नम को

अच्छा जी

क्या ज़रूरी
कि तुम्हारी इन झूठी तालियों के लिए
मैं हरामी ना बन जाऊँ
हरामखोरों

क्या ज़रूरी.

- शैलेन्द्र साहू, मुंबई| 

[शैलेन्द्र की दूसरी कविता यहाँ  ]

Saturday, 22 July 2017

बूढ़ा लाइब्रेरियन - मनाश ग्रेवाल

कितनी रात हो गई है। हवा धीरे से इस लाईब्रेरी के जर्जर किवाड़ों से टकराती है। मानो हिमालय की कंदराओं से कोई आत्मा कुछ पढ़ने आई है। लालटेन की जलती हुई लौ, सीलन लगी दीवारों पर चहलक़दमी करती है।
अलस्सुबह मैं ऊठूँगा और जिस किताब पर जमी गर्द के साथ छेड़छाड़ की गई हैं, उसे उठाकर आगे बढ़ जाऊँगा; फिर किसी एक गुमनाम और भूतहा लाईब्रेरी की तलाश में।
दरअसल ये लाईब्रेरियाँ एक जंक्शन की तरह हैं. मानचित्र की तरह। आत्माओं के अंडरवर्ल्ड में प्रवेश बिंदू सी, अवैध जुआघर सी, मेरे साथ-साथ ये खुद भी इस अंधेरी दुनिया के सरगना की तलाश में हैं।

उस बूढ़े लाईब्रेरियन ने कहा, -तुम पुस्तकें यहीं पढ़ सकते हो। बाहर ले जाने के लिए वो तुम्हें नहीं मिलेंगी।
मैंने पूछा, - क्यों?
बूढ़ा रहस्यमय ढंग से बोला- क्योंकि वे सभी गर्भवती हैं.

(आज की रात यहीं. द्वितीय विश्वयुद्ध के समय की चर्च जो कालांतर में एक खंडहरनुमा लाईब्रेरी में बदल गई. 88 साल का बूढ़ा, अंगीठी और लाइब्रेरी के पीछे पहाड़ की ढ़लान पर पाँच कब्रें। इसी बूढ़े के परिवार की।)

'बूढ़े लाइब्रेरियन' से वार्तालाप जारी है, वह कहता है-

"किताबें सामूहिक और व्यक्तिगत रूप से क्रमश: सभ्यता और लेखक की अस्थियाँ होती हैं| अपनी मृत्यु के बाद भी लेखक कहीं न कहीं फँसा रह जाता है| हाँ, किताबों में, अपनी तरल तरह की अवस्था में| उनकी मुक्ति ज़रूरी है|"

"तो फिर आप इतने सालों से इनका सरंक्षण क्यों कर रहे हैं?" मैंने लाईब्रेरी में रखी किताबों की ओर इशारा करते हुए पूछा|

बूढ़ा कुछ देर चुप रहा फिर जैसे कुछ तय करता हुआ सा बोला- "मैं हर रात एक किताब अंगीठी में जला देता हूं| मेरी सर्दियाँ ऐसे ही गुजरती हैं|"

अचानक मेरे नथूनों से जैसे जले हुए माँस और खून की बू टकराई हो| मैं तेज़ी से खिड़की की तरफ़ भागा|

(वैसे जो भी हो, यह बूढ़ा मुझे पसंद आ रहा है|)

मुझे लगा बूढ़ा इन सब चीज़ों से अनभिज्ञ होगा| मैं मनुष्य और प्रकृति के बिगड़ते संबंधों और विज्ञान पर चर्चा नहीं करना चाहता था| मैंने विषयांतर करना चाहा, लेकिन बूढ़े ने मुझे टोक दिया| वह काले आकाश में कहीं दूर झांकते हुए बोला- "पृथ्वी हमारा घर नहीं है| हम सब वहीं जा रहे हैं|"
अगर सेबों के बाँझ पेड़ों का वह झुरमुट नहीं होता तो लाइब्रेरी की खिड़की से वो पाँचों कब्रें साफ़ दिखाई देतीं|
किसी उनींदी प्रेमिका की तरह, मेरे सहारे के साथ-साथ वह बूढ़ा बड़ा धीरे-धीरे चल पा रहा था|

"ये सेब के पेड़ बाँझ क्यों हैं?" कब्रों के पास पहुँचते ही मेरा पहला सवाल|

"क्योंकि वो भी मेरे परिवार के सदस्य हैं|" बूढ़े के स्वर में भारी अफ़सोस था, मानो जैसे वह खुद से ही नाराज़ हो, कि वह अनाथ क्यों नहीं था|

कब्रें बहुत बुरी हालत में थीं| आधी-अधूरी उधड़ी हुई| मैंने बूढ़े की तरफ़ भूकम्प की तरह देखा|

"लाशों को दफ़नाने के कई सालों बाद, जब मुझ पर अकेलेपन के दौरे पड़ने लगे तो एक रात मैं कुदाल उठाकर यहाँ चला आया| हालांकि अधूरेपन ने यहाँ भी मेरा पीछा नहीं छोड़ा और उस रात के हिमपात ने मेरे काम में बाधा डाल दी| मुझे याद है उस साल सेब बहुत सड़े थे| शायद किसी मुल्क ने तुम्हारे देश पर हमला भी किया था|" इतना कहकर बूढ़ा चुप हो गया और अपनी साँसों को नियंत्रित करने लगा|

"फिर......अधूरा क्यों?......आप कुदाल का प्रयोग फिर से कर सकते थे| क्या आप पर फिर कभी वो दौरे नहीं पड़े?"

"वह शीत युद्ध का दौर था| विज्ञान ने मेरे अध्यात्म को निर्ममता से कुचल दिया| विज्ञान की किताबों ने मुझे यक़ीन दिलाया कि आत्मा जैसा कुछ नहीं था| यह सचमुच बहुत दर्दनाक था| मृत्यु का कोई उद्देश्य ही नहीं बचा| (आज से पहले) मैंने फिर कभी भी इन कब्रों की तरफ़ झांककर नहीं देखा| उसके बाद से ही कविताएं फिर कभी मेरे अंदर से नहीं फूटीं| हालांकि उससे कोई फर्क़ नहीं पड़ने वाला था क्योंकि मैं अपनी रचनाओं का इकलौता पाठक था| काश हम जंगल के जानवर की तरह एक निरी और महीन सी अज्ञानता में मरते|" इतना कहकर बूढ़ा अपने चेहरे पर एक फक़ीरी सी मुस्कान ले आया मानो जैसे वह जीवन के सौन्दर्य पर कै करने की कोशिश कर रहा हो|

"इतना निराशावाद भी ठीक नहीं|" मैंने बूढ़े के हाथों को अपने हाथों में दबाते हुए कहा|

"मैं तुम्हें नहीं जानता| मुलाक़ात समाप्त हुई और तुम्हारा प्रवास भी| अब तुम जा सकते हो|" बूढ़े के तेवर बदल गये थे|

कुछ दूर जाकर बूढ़ा रूका और मेरी तरफ़ पलटते हुए बोला- "निराशावाद!.........क्या जानते हो तुम निराशावाद के बारे में? सुनो!........धरती की तरह मैं भी सिर्फ़ तीस साल का था जब पहली बार आत्महत्या का विचार मेरे जेहन में आया| उस विचार ने लगभग छ: दशकों तक रात-दिन मेरा पीछा किया, लेकिन मैं अपनी स्वाभाविक मौत मरा| और तुम बात करते हो निराशावाद की|"

(पहाड़ से नीचे उतरते हुए मुझे तलहटी के एक गाँव के लोगों ने बताया कि तुम तीन दिन तक किसके साथ थे? उस लाईब्रेरी में तो कोई नहीं रहता|)


[मनाश ने यह कथा अंश अपने फेसबुक वॉल पर ही लिखा था जिसे यहां पर सम्पादित करके लगाया जा रहा है। वे इस कहानी को एक मुकम्मल विस्तार देने में संलग्न है और आशा है कि जल्द ही हमें यह रोचक कहानी अपनी संपूर्णता में पढ़ने को मिलेगी।]

Saturday, 8 July 2017

पुनर्जीवन- रोबर्टो बोलान्यो

कविता स्वप्न में उतरती है
जैसे एक गोताखोर झील में,
कविता, किसी भी अन्य चीज की तुलना में अधिक साहसी,
उतरती है और डूब जाती है
जैसे एक शीशा
लोच नेस जैसे अंतहीन झील से होकर
या बालाटन झील जैसे त्रासद और मैले झील में|

इसे ऐसे देखें:
एक गोताखोर
निर्दोष
इच्छाओं के पंख से ढंका हुआ

कविता स्वप्न में उतरती है
जैसे ईश्वर की दृष्टि में
एक मृत गोताखोर|

- रोबर्टो बोलान्यो, चिली
द रोमांटिक डॉग्स से.
(लॉरा हिली के अंग्रेजी अनुवाद पर आधारित हिंदी अनुवाद: आदित्य)

Monday, 3 July 2017

एक स्वप्न - फ्रैन्ज़ काफ्का

जोसेफ के. स्वप्न देख रहा था।

एक खुशनुमा दिन था और के. को टहलने की इच्छा हुई। मुश्किल से वह कुछ ही कदम चला था और एक कब्रगाह में पहुँच गया। रास्ते बहुत घुमावदार थे, विदग्ध और अव्यवहारिक थे, लेकिन वह उनमें से किसी एक पर धीरे से चल पड़ा जैसे कोई प्रवाह में असंतुलित रूप से फिसल जाता है। दूर से ही उसकी नजर एक नए कब्र के टीले पर पड़ी जहाँ वह रुकना चाह रहा था। कब्र के उस टीले ने उसे इतना अधिक सम्मोहित कर दिया था कि उसे वहां जल्द से जल्द नहीं पहुँच पाने की टीस होने लगी। बीच बीच में टीला उसकी दृष्टि से ओझल हो जाता था, क्योंकि उसकी दृष्टि बार बार उन बैनरों से बाधित हो रही थी जो एक दूसरे से काफी तेज गति से लड़-टकरा रहे थे, उन्हें कौन लेकर चल रहा था यह तो ज्ञात नहीं हो पा रहा था पर कोई तो बहुत उल्लासपूर्ण उत्सव जारी था।

जबकि वह अभी अपने रास्ते में ही था, उसने अचानक ही देखा कि वह टीले के पास ही पहुँच गया है और लगभग उससे आगे ही निकल रहा है। जल्दबाजी में वह घास के ऊपर उछला। पर चूंकि रास्ता उसके पैरों के नीचे से तीव्र गति से निकल रहा था, वह लड़खड़ाकर टीले के ठीक सामने अपने घुटनों के बल गिर गया। दो लोग कब्र के पीछे खड़े थे और अपने हाथों में समाधिलेख उठाए हुए थे, के. अभी वहां पहुंचा ही था कि उन्होंने समाधिलेख को इस तरह से फेंका मानो वह उस टीले में पहले से स्थापित हो रखी हो। झाड़ियों में से अचानक एक तीसरा व्यक्ति निकलकर आया जिसे के. ने एक कलाकार के रूप में पहचाना। वह एक ट्रॉउजर और बेढ़ंगे तरीके से बटन लगाए हुए शर्ट पहने था, उसके सिर पर एक वेलवेट की टोपी थी; उसके हाथों में एक साधारण सी पेंसिल जिससे वह हवाओं में कोई आकृति बना रहा था आते हुए।

(काफ्का म्यूजियम, प्राग)
पेंसिल हाथ में लिए हुए वह समाधिलेख के ऊपरी सिरे तक पहुँचा; पत्थर काफी ऊँचा था, उसे नीचे नहीं झुकना पड़ा, हलांकि उसे थोड़ा आगे की ओर आना पड़ा, क्योंकि कब्र का टीला जिसपर वह पैर रखने से बच रहा था, उसके और पत्थर के बीच आ रहा था। इसलिए वह अपने अंगूठों पर खड़ा हुआ और अपने बाएं हाथ से पत्थर के समतल सतह पर रखते हुए खुद को सीधा किया। एक आश्चर्यजनक कौशल का प्रदर्शन करते हुए उसने अपने साधारण से पेन्सिल से सुनहरे शब्द लिखे : 'यह समाधि', प्रत्येक शब्द स्पष्ट और सुंदर तरीके से उकेरे गये थे, पत्थर में गहरे खुदे हुए, और शुद्ध स्वर्ण में। जब उसने यह दो शब्द अंकित कर लिए थे, उसने कनखियों से के. की ओर देखा, जो उन पत्थर पर अंकित होने वाले शब्दों की व्यग्रता से प्रतीक्षा कर रहा था, जिसका कलाकार पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं था और पत्थर की ओर एकाग्र दृष्टि से देख रहा था। असल में वह फिर से लिखने को उद्धत हुआ, पर लिख नहीं सका, कुछ तो था जो उसे रोक रहा था, उसने पेंसिल छोड़ दिया और एक पुनः के. की ओर मुड़ा। इस बार के. ने इस बात पर ध्यान दिया कि वह बहुत अधिक शर्मिंदा था और फिर भी कुछ स्पष्ट कर पाने में असमर्थ था। जिससे के. भी शर्मिंदा हो गया, दोनों ने एक दूसरे को असहाय दृष्टि से देखा, उन दोनों के बीच एक भयानक नासमझी उत्पन्न हो चुकी थी जिसे दोनों में से कोई भी सुलझा पाने में असमर्थ था। और तभी कब्रगाह के चर्च से असमय घण्टियाँ बजने लगीं, लेकिन कलाकार ने हाथ उठाकर कुछ संकेत किया और घण्टियाँ बन्द हो गईं। कुछ देर बाद घण्टियाँ पुनः बजने लगीं, इस बार मद्धम स्वर में, बिना किसी आग्रह के मानो अपनी ही ध्वनि की परीक्षा ले रहीं हों। कलाकार की दशा देखकर के. खुद दयनीय महसूस करने लगा, रोना शुरू कर दिया और अपने हाथों से अपना चेहरा छिपाकर सुबकने लगा। कलाकार ने के. के चुप हो जाने की प्रतीक्षा की और फिर कोई और रास्ता न देखकर अंकण का काम जारी रखने का निर्णय लिया। के. ने जैसे ही कलाकार की पहली छोटी सी अंकण ध्वनि सुनी, कुछ राहत महसूस किया हलांकि कलाकार स्पष्टतः बहुत कठिनाई से यह कर पाया था और अंकण भी पहले की तरह सुन्दर नहीं बन पाया, क्योंकि उकेरे हुए में स्वर्णाक्षरों की कमी दिखाई दी, अनिश्चित और अदृढ़ तरीके से अंकण का हो रहा था और अंततः यह एक बहुत बड़ा अक्षर बन पाया। जो कि J था, जो लगभग लिखा जा चुका था, तभी कलाकार ने कब्र के टीले पर अपने एक पैर से जोर का प्रहार किया और चारों तरफ हवाओं में मिट्टी ही मिट्टी हो गई। अंततः के. को अब समझ में आया, लेकिन अब क्षमा-याचना के लिए बहुत देर हो चुकी थी, अपनी सभी उँगलियों को उसने धरती में धंसाया जिससे उसे कोई प्रतिरोध न मिला, मानो जैसे सब कुछ पहले से तैयार करके रखा हो, और मिट्टी की एक पतली सी परत जैसे सिर्फ ऊपरी भ्रम हो, जिसके ठीक नीचे एक विशाल खड्ड था, में के. गिर गया, उसके गिरने के बाद एक हल्की सी प्रतिध्वनि सुनाई दी। और जबकि वह खड्ड की अभेद्य गहराइयों में उतर रहा था, उसका सिर अभी भी सीधा था और जिससे उसकी गर्दन पर जोर पड़ रहा था, ऊपर समाधिलेख पर उसका नाम सुनहरे अक्षरों में जल्दी जल्दी उकेर दिया गया।

इस दृश्य से मंत्रमुग्ध होकर वह नींद से जाग उठा।

[एडविन और विला मूइर के अंग्रेजी अनुवाद पर आधारित हिंदी तर्जुमा: आदित्य शुक्ल]

Sunday, 2 July 2017

संकर - फ्रैन्ज़ काफ्का

मेरे पास एक विचित्र जंतु है, आधा बिलौटा, आधा मेमना। यह मुझे मेरे पिता से विरासत में मिला था, लेकिन इसका ऐसा विकास मेरे जीवनकाल में ही हुआ है, पहले यह मेमना अधिक और बिलौटा कम था, लेकिन अब इसमें दोनों जंतुओं का समान भाग है। इसके सर और पंजे बिल्ली के हैं और इसकी आकृति आकार मेमने की है, इसकी आँखें दोनों जंतुओं की है, क्योंकि वे चमकते हैं और मद्दम भी हैं, इसके फर थोड़े मुलायम और घने हैं, इसकी चाल में दोनों के गुण हैं, थोड़ी फुर्ती और थोड़ी-सी लज्जा भी, धूप सेंकने यह खिड़की की देहरी पर बैठता है और गुर्राता है, खेतों में यह पागलों की तरह दौड़ता है और मुश्किल से पकड़ में आता है। यह बिल्लियों से बचता है और मेमनों पर कूद पड़ने की कोशिश करता है। चांदनी रात में यह छतों पर चलना पसन्द करता है, यह म्याऊं नहीं कर पाता और चूहों को नापसन्द करता है। यह मुर्गियों के बाड़े में घण्टों तक रह सकता है लेकिन इसने अब तक उन्हें मारने की कोई कोशिश नहीं की। मैं इसे मीठा दूध पिलाता हूँ, जो इसे बहुत पसंद है, जिसे यह अपनी भक्षक खंगों से चूसता है। हां, यह बच्चों के लिए वाकई सुनहरा दृश्य है। रविवार सुबह प्रदर्शनी का समय होता है - मैं इस छोटे जीव को अपनी गोद में रखता हूँ और समूचे पड़ोस के बच्चे मुझे आकर घेर लेते हैं। वे अजीबोगरीब प्रश्न पूछते हैं, जिसका उत्तर देने की जहमत मैं नहीं उठाता, लेकिन मैं उन्हें वह दिखाना पसन्द करता हूँ जो मेरे पास है। कभी-कभी बच्चे अपने साथ बिल्लियां लेकर आते हैं, और एक बार तो एक अपने साथ दो मेमने भी ले आया, लेकिन उनकी उम्मीदों के विपरीत, एक दूसरे को वे जंतु पहचान नहीं सके; जंतुओं ने अपनी जंतु-दृष्टि एक दूसरे को शांत मुद्रा में देखा, स्पष्टतः उन्होंने एक दूसरे के अस्तित्व को ईश्वर-प्रदत्त तथ्य मानकर स्वीकार कर लिया था।

मेरी गोद में बैठे जंतु में कोई भय नहीं होता, ना ही शिकार करने की कोई इच्छा। यह मुझसे सटकर बहुत प्रसन्न महसूस करता है। यह उस परिवार के प्रति वफादार है जो इसकी देखभाल करता है। मैं यह कहने का साहस करना चाहूंगा कि यह वफादारी कोई विशेष प्रकार की नहीं है, बल्कि एक जंतु की सिर्फ सच्ची अंतःप्रेरणा है, जिसके लिए इस पृथ्वी पर अनेकानेक सह-प्राणी हैं, लेकिन शायद एक भी करीबी खून का सम्बन्धी नहीं, और इसे हमारे साथ जो सुरक्षा मिली उससे इसे भय ही है। कभी-कभी मैं इसपर हँसता हूँ जब यह मेरे चारों ओर घूमता है, मेरे पांवों के बीच से गुजरता है और मुझसे अलग नहीं होना चाहता है। यह न तो बिल्ली का गुण है ना ही मेमने का, इसे तो अब लगभग श्वान तक बनने की इच्छा है। मैं इस बात पर गंभीरता से विश्वास करता हूँ कि इसके अंदर दोनों ही जीवों - बिल्ली और मेमने जैसी बेचैनी है, चाहे से भी वे कितने ही भिन्न क्यों न हों। इसीलिए यह अपनी ही त्वचा के भीतर असुविधा का एहसास करता है। शायद एक कसाई का चाकू इसे इसकी पीड़ा से मुक्ति दिला सके; परन्तु चूंकि मैंने इसे अपनी विरासत में हासिल किया ऐसा होने नहीं दूंगा।

[जॉन आर विलियम्स के अंग्रेजी अनुवाद से हिंदी तर्जुमा: आदित्य शुक्ल]

Tuesday, 27 June 2017

यहीं के पास एक खाली जगह - रोबर्टो बोलान्यो


''उसकी मूंछें सफ़ेद थीं  या शायद भूरी हों''...
''मैं अपनी स्थिति  के बारे में सोच रहा था, मैं फिर से अकेला था
और क्यों था यह समझने की कोशिश कर रहा था''...
''वहां एक दुबला-पतला आदमी एक मृत शरीर के ऊपर झुककर तस्वीरें ले रहा है''... ''मुझे पता है
यहाँ एक खाली जगह है लेकिन पता नहीं कहाँ''...

-रोबर्टो बोलान्यो  , चिली
अनुवाद- आदित्य शुक्ल 

Friday, 23 June 2017

नींद ही है कि सच है - आदित्य शुक्ल


अधखुली आँखों से नींद टपकता,
बिस्तर रेशमी होता जाता है। तुम्हे आधा देखते और आधा छूते मैं पूछता हूँ-
देखो तो सुबह हो आई है क्या, यह झुटपुटा सा क्यों है, सूरज लाल है क्या क्षितिज पर देखो तो।
मानसून की पहली बारिश है, हो रही। सड़कें भीग गयी है। कोई दो प्रेमी इस मिट्टी के रस्ते से गुजरे हैं;
बारिश हो रही है।
आँखों से टपकती है नींद बिस्तर रेशमी होता जाता है तुम कहती हो:
चलो कहीं चले चलते है।
दूर।
तो क्या तुम मेरे साथ गाँव चलोगी, वहां हम खेतों में काम करेंगे और गन्ने और मक्के उगाएंगे
गाँव के लोगों ने कामचोरी में आकर ऐसी खेती करनी बन्द कर दी है या शायद वे उम्मीद करते करते ऊब गए हैं अब कुछ और नहीं, अब ईश्वर ही उनका एकमात्र सहारा है। वे अब मंदिरों और प्रार्थनाओं में अधिक मान्यताएं रखने लगे है। बजाए इसके कि वे खेती करते।
गाँव चलोगी क्या,
या अगर मन बदल जाए तो मैं तुम्हारे साथ गाँव को जाने के लिए बैठे ट्रक पर से अचानक उतरकर कहूँ
कि नहीं, नहीं। मैं अब गाँव नहीं जाना चाहता। चलो पहाड़ों पर चलते हैं जहाँ हमें कोई भी जानता नहीं। तो फिर भी तुम चलोगी क्या?
तुम मौन हो स्वप्न में मौन हो। पर तुम्हारी आँखें खुली हैं। पूरी की पूरी। तुम्हारी आँखों में दृश्य चल रहा होगा। दृश्य हमें मौन कर देते हैं फिर तुम कहती हो:
हाँ, चलो न। चलो कहीं भी। कहीं से उतर कर कहीं भी चले चलेंगे। मैं थोडा बहुत जितना भी जीना चाहती हूं वो बस तुम्हारे साथ। अगर हम पहाड़ों पर चले तो वहां एक स्कूल चलाएंगे। अब मुझे कभी-कभी बच्चों को पढ़ाने का मन करता है।
यह कहकर अकस्मात् तुम्हारी आँखों से नींद टपकती है बिस्तर किसी विशाल समुद्र में तब्दील हो जाता है।

मानसून की पहली बारिश है अलसुबह, अखबार बेचने वाला पुराने रेनकोट में आधा भीगते और चिल्लाते हुए कहीं से आ रहा है और कहीं को ओर चला गया। अखबारों में पता नहीं कैसी-कैसी ख़बरें हैं। कोई अच्छी खबर होती तो वह मेरे घर की बालकनी में भी अखबार फेंक जाता या पिछले महीने का बकाया मांगने आ जाता जब मैं या तुम अधखुली नींद में एक घण्टे बाद आने को कह देते।

नींद ऐसी टपकती है कि सब कुछ रेशम हो जाता है शहतूत के पौधे पर लगे फल मीठे हो जाते हैं और हम तोड़ते बीनते खाते जाते हैं। नींद टपकती आँखों के सामने न जाने किस फूल के पौधे पर तितलियाँ मंडरा रही हैं तितलियाँ ही हैं कि न जाने कुछ और और स्वप्न में नींद का ऐसा खुमार है कि तितलियाँ जान पड़ती हैं वे।

- आदित्य शुक्ल, गुडगाँव।

Thursday, 22 June 2017

समझने की जरूरत - धनञ्जय शुक्ल

काम करने के दो तरीके हैं, या तो व्यक्तिगत काम किए जाएं या फिर लोगों के साथ मिलकर। व्यक्तिगत कामों में दूसरा ऑब्जेक्ट की तरह होता है। लेकिन जब दूसरों के साथ मिलकर काम करते हैं तो कोई ऑब्जेक्ट नही होता । ऑब्जेक्ट काम ही होता है, वह काम करना पड़ता है । और इसका हमें चुनाव करना पड़ता है कि कौन सा काम करना है । जैसे जितने लोग हैं , उनके जीवन यापन के लिए आधार ढूंढना है । लेकिन उसमें तरह-तरह के लोग होते हैं जो अलग-अलग मांग रखते हैं । तो एक बाह्य अनुशासन निर्मित करना पड़ता है। यह अनुशासन ही नियम-कानून बन जाता है। जो राष्ट्रीय स्तर पर संविधान की तरह का काम करता है। इसके अलावा एक नैतिकता जन्म लेती है, जो हमें निर्देशित करती है। यदि हम इसे सबके हित में समझते हैं तो सहजता से करते हैं, नहीं तो विरोध करते हैं, और यह विरोध अंततः विद्रोह और क्रांतिकारी दिशा में चला जाता है । यह किसी भी विधा के साथ  है । अब अगर हम इतिहास पर ध्यान दें तो मनुष्य के विकास में तमाम तरह के पड़ाव आये हैं । जिनसे मनुष्य ने तमाम सीख ली है और उसके आधार पर मनुष्य ने तमाम व्यवस्थाएं खड़ी की है। साथ ही व्यवस्थाओं के विरोध करने वाले लोग भी हुए हैं। इस तरह से व्यवस्था निर्मित करने वालों और व्यवस्था के उखाड़ फेंकने वालों का एक पूरा ऐतिहासिक दस्तावेज मौजूद है । हर पीढ़ी के आने वाले लोग अपनी चेतना और अपनी समझ के अनुसार अपनी भूमिका चुनते रहते हैं, और दुनिया में हमेशा एक युद्ध जैसी स्थिति बनी रहती है। यह सब बहुत जटिल है लेकिन फिर भी इसे समझना हो तो उन लोगों की तरफ ध्यान जाता है जो इस पर काम कर रहे होते हैं । लोग उन्हें याद रखते हैं । मौखिक रूप से और किताबों के माध्यम से भी। और जब बात किताबों की शुरू होती है तो किताबें बहुत सी हैं, उन्हें लिखने वाले लोग बहुत से हैं , उन पर काम करने वाले लोग भी बहुत से हैं । और ऐसी स्थिति में जब कोई नया पढ़ने, समझने, लिखने वाला व्यक्ति, अपने आसपास की दुनिया और किताबों को देखता है तो उसके सामने यह समस्या खड़ी होती है कि वह किसे चुने और क्या पढ़े । जो सबके हित में हो, सबके हित में न भी हो तो , ज्यादा से ज्यादा लोगों के हित में हो । अब दो तरह के लोग दिखाई पड़ते हैं, एक वह जो अपने आपको आत्मज्ञानी कहते हैं। और एक वह जो तमाम तरह की चीजों पर शोध करते हैं और उसे सबके सामने रखते हैं । अब जबकि सब कुछ सब के सामने डिस्प्ले है, तमाम तकनीकी माध्यमों के द्वारा, तो अन्य कामों की अपेक्षा यह भी एक काम है कि इन सूचनाओं से, उन चीजों को कैसे निकाला जाए, जो अपने हित में हो , बल्कि पूरे मनुष्य के हित में हो । मनुष्य ही क्यों सभी के हित में हो,  यहां तक कि पर्यावरण के भी, वो हमसे अलग नहीं है । तो समझना समझाना बहुत ही महत्वपूर्ण काम हो जाता है । पहले स्वयं ही समझना फिर जो आपको सुन रहा हो उसे समझाना, समझाने की तरह नहीं समझाना , बल्कि बातचीत करते हुए समझने की प्रक्रिया से गुजरते हुए समझना । इस तरह की पहल कम से कम उन लोगों के लिए जरूरी काम है, जो इतने संवेदनशील हैं कि आस-पास क्या घट रहा है उसे समझ सकें । तमाम मोर्चो पर ऐसी चीजें घट रही हैं । जिसे न समझ पाने से हम सबका व्यक्तिगत और सामूहिक स्तर पर बहुत नुकसान हो रहा होता है । जैसे राजनीतिक फैसले, और एक राष्ट्र से दूसरे राष्ट्र के सम्बन्धों पर पड़ते हुए प्रभाव को समझने समझाने वाले लोग , यानि वैश्विक राजनीतिक समझ वाले लोगों की भूमिका । आर्थिक समझ रखने वाले लोग , और उन नीतियों को बनाने लोग , उससे हर एक व्यक्ति पर पड़ने वाले प्रभाव को समझने वाले लोग , इन सबको सरलता से समझा पाने वाले लोग । साहित्य की वे तमाम विधाएं जो यह बता पाती है कि समष्टि की क्रियाविधि का व्यष्टि पर किस तरह प्रभाव पड़ता है । उसके लिए काम करते हुए और छटपटाते हुए तमाम लोग किस तरह अपने जीवन को जी रहे होते हैं और तकनीक का असर कहाँ किस पर किस तरह पड़ रहा है और किन पर किस तरह प्रभाव डाला जा रहा है । यह सब समझने वालों को समझा जा सके। यह सब जरूरी काम हैं!

- धनञ्जय शुक्ल, लखनऊ

Monday, 19 June 2017

फिरोज़ा - शायक अलोक

अभी अभी आई है फिरोज़ा 
बिस्तर पर पटक कर बस्ता 
नहाने गई है 

मैं फिरोज़ा को नहाते हुए देखता हूँ रोज़ 
जानती है फिरोज़ा  
फिरोज़ा ने बताया था 
कितने और कैसे कैसे अलग होते हैं
लड़के और लड़कियां 
और हमने जीभ जीभ इमली चखा था...

बचपन में बताया तो गया था मुझे 
कि हिन्दुओं के एकदम उलट होते हैं मुसलमान 
और उसने तस्दीक भी कर दी 
हाँ, पर, स्वीकार नहीं किया मैंने ..

बुरी लड़की थी फिरोज़ा  
मुझे बताये बिना चली गयी 
सुना था 
निकाह कर लिया 
अपने ही किसी भाई से 
रहता था जो दूर दिल्ली में कहीं. 

उसी दिन मेरे लिए मर गयी फिरोज़ा  
मैंने चिन्हित भी कर दी 
उसके नाम की कब्र 
एक तीर वाला दिल अब भी दिखता है वहां 
मेरी रोपी नागफनी 
पूरे कब्रिस्तान में फैली है 

कब्रिस्तान की टूटी दीवार पर पैर नीचे लटकाए
मैं खाता हूँ मूंगफली 
वहीं खाली पड़ी कब्र में सर के बल खड़ी रहती है फिरोज़ा  

फिरोज़ा अब एक भूत है
नहीं लिखूंगा फिर उस भूत पर कविता..

- शायक अलोक, नई दिल्ली

रतजगा - सोमेश शुक्ल





जमाते उल्फत किस खिजाँ का क्या करिये
कभी उसको तो कभी खुदको आंका करिये

क्या अंजाम-औ-फक़त जी पे जब आ लगे ये जिन्दगी
इससे चूककर इसको, इसके निशाँ का करिये। 
- सोमेश शुक्ल, नई दिल्ली




हरियाली का गीत - शैलेन्द्र साहू

एक दिन के लिए ही सही
मनुष्य ने अपनी सारी कमज़ोरियों को
धूप में सूखने के लिए डाल दिया
और मछलियों ने इस पूरे किस्से को
किसी लोकगीत की तरह गुनगुनाया .

जबकि उम्मीद शब्द एक झुनझुना है
और हरियाली के गीत
हमेशा ही किन्ही उदास कवियों ने लिखा है

अगर इसे दूसरी तरह से कहूँ
तो मै ये देखता हूँ
की कहीं किसी सुदूर रेगिस्तान में
एक आदमकद आइना है रखा हुआ
जिस पर प्रतिबिंबित होती छवि
समूची कायनात है
और यकीन मानिए
मैंने उस पर कभी धूल की एक परत तक नहीं देखी

एक दिन के लिए ही सही
ऐसी ख़ुशफ़हमी भी क्या बुरा।


- शैलेन्द्र साहू, मुंबई