काम करने के दो तरीके हैं, या तो व्यक्तिगत काम किए जाएं या फिर लोगों के साथ मिलकर। व्यक्तिगत कामों में दूसरा ऑब्जेक्ट की तरह होता है। लेकिन जब दूसरों के साथ मिलकर काम करते हैं तो कोई ऑब्जेक्ट नही होता । ऑब्जेक्ट काम ही होता है, वह काम करना पड़ता है । और इसका हमें चुनाव करना पड़ता है कि कौन सा काम करना है । जैसे जितने लोग हैं , उनके जीवन यापन के लिए आधार ढूंढना है । लेकिन उसमें तरह-तरह के लोग होते हैं जो अलग-अलग मांग रखते हैं । तो एक बाह्य अनुशासन निर्मित करना पड़ता है। यह अनुशासन ही नियम-कानून बन जाता है। जो राष्ट्रीय स्तर पर संविधान की तरह का काम करता है। इसके अलावा एक नैतिकता जन्म लेती है, जो हमें निर्देशित करती है। यदि हम इसे सबके हित में समझते हैं तो सहजता से करते हैं, नहीं तो विरोध करते हैं, और यह विरोध अंततः विद्रोह और क्रांतिकारी दिशा में चला जाता है । यह किसी भी विधा के साथ है । अब अगर हम इतिहास पर ध्यान दें तो मनुष्य के विकास में तमाम तरह के पड़ाव आये हैं । जिनसे मनुष्य ने तमाम सीख ली है और उसके आधार पर मनुष्य ने तमाम व्यवस्थाएं खड़ी की है। साथ ही व्यवस्थाओं के विरोध करने वाले लोग भी हुए हैं। इस तरह से व्यवस्था निर्मित करने वालों और व्यवस्था के उखाड़ फेंकने वालों का एक पूरा ऐतिहासिक दस्तावेज मौजूद है । हर पीढ़ी के आने वाले लोग अपनी चेतना और अपनी समझ के अनुसार अपनी भूमिका चुनते रहते हैं, और दुनिया में हमेशा एक युद्ध जैसी स्थिति बनी रहती है। यह सब बहुत जटिल है लेकिन फिर भी इसे समझना हो तो उन लोगों की तरफ ध्यान जाता है जो इस पर काम कर रहे होते हैं । लोग उन्हें याद रखते हैं । मौखिक रूप से और किताबों के माध्यम से भी। और जब बात किताबों की शुरू होती है तो किताबें बहुत सी हैं, उन्हें लिखने वाले लोग बहुत से हैं , उन पर काम करने वाले लोग भी बहुत से हैं । और ऐसी स्थिति में जब कोई नया पढ़ने, समझने, लिखने वाला व्यक्ति, अपने आसपास की दुनिया और किताबों को देखता है तो उसके सामने यह समस्या खड़ी होती है कि वह किसे चुने और क्या पढ़े । जो सबके हित में हो, सबके हित में न भी हो तो , ज्यादा से ज्यादा लोगों के हित में हो । अब दो तरह के लोग दिखाई पड़ते हैं, एक वह जो अपने आपको आत्मज्ञानी कहते हैं। और एक वह जो तमाम तरह की चीजों पर शोध करते हैं और उसे सबके सामने रखते हैं । अब जबकि सब कुछ सब के सामने डिस्प्ले है, तमाम तकनीकी माध्यमों के द्वारा, तो अन्य कामों की अपेक्षा यह भी एक काम है कि इन सूचनाओं से, उन चीजों को कैसे निकाला जाए, जो अपने हित में हो , बल्कि पूरे मनुष्य के हित में हो । मनुष्य ही क्यों सभी के हित में हो, यहां तक कि पर्यावरण के भी, वो हमसे अलग नहीं है । तो समझना समझाना बहुत ही महत्वपूर्ण काम हो जाता है । पहले स्वयं ही समझना फिर जो आपको सुन रहा हो उसे समझाना, समझाने की तरह नहीं समझाना , बल्कि बातचीत करते हुए समझने की प्रक्रिया से गुजरते हुए समझना । इस तरह की पहल कम से कम उन लोगों के लिए जरूरी काम है, जो इतने संवेदनशील हैं कि आस-पास क्या घट रहा है उसे समझ सकें । तमाम मोर्चो पर ऐसी चीजें घट रही हैं । जिसे न समझ पाने से हम सबका व्यक्तिगत और सामूहिक स्तर पर बहुत नुकसान हो रहा होता है । जैसे राजनीतिक फैसले, और एक राष्ट्र से दूसरे राष्ट्र के सम्बन्धों पर पड़ते हुए प्रभाव को समझने समझाने वाले लोग , यानि वैश्विक राजनीतिक समझ वाले लोगों की भूमिका । आर्थिक समझ रखने वाले लोग , और उन नीतियों को बनाने लोग , उससे हर एक व्यक्ति पर पड़ने वाले प्रभाव को समझने वाले लोग , इन सबको सरलता से समझा पाने वाले लोग । साहित्य की वे तमाम विधाएं जो यह बता पाती है कि समष्टि की क्रियाविधि का व्यष्टि पर किस तरह प्रभाव पड़ता है । उसके लिए काम करते हुए और छटपटाते हुए तमाम लोग किस तरह अपने जीवन को जी रहे होते हैं और तकनीक का असर कहाँ किस पर किस तरह पड़ रहा है और किन पर किस तरह प्रभाव डाला जा रहा है । यह सब समझने वालों को समझा जा सके। यह सब जरूरी काम हैं!
- धनञ्जय शुक्ल, लखनऊ