Tuesday, 27 June 2017

यहीं के पास एक खाली जगह - रोबर्टो बोलान्यो


''उसकी मूंछें सफ़ेद थीं  या शायद भूरी हों''...
''मैं अपनी स्थिति  के बारे में सोच रहा था, मैं फिर से अकेला था
और क्यों था यह समझने की कोशिश कर रहा था''...
''वहां एक दुबला-पतला आदमी एक मृत शरीर के ऊपर झुककर तस्वीरें ले रहा है''... ''मुझे पता है
यहाँ एक खाली जगह है लेकिन पता नहीं कहाँ''...

-रोबर्टो बोलान्यो  , चिली
अनुवाद- आदित्य शुक्ल 

Friday, 23 June 2017

नींद ही है कि सच है - आदित्य शुक्ल


अधखुली आँखों से नींद टपकता,
बिस्तर रेशमी होता जाता है। तुम्हे आधा देखते और आधा छूते मैं पूछता हूँ-
देखो तो सुबह हो आई है क्या, यह झुटपुटा सा क्यों है, सूरज लाल है क्या क्षितिज पर देखो तो।
मानसून की पहली बारिश है, हो रही। सड़कें भीग गयी है। कोई दो प्रेमी इस मिट्टी के रस्ते से गुजरे हैं;
बारिश हो रही है।
आँखों से टपकती है नींद बिस्तर रेशमी होता जाता है तुम कहती हो:
चलो कहीं चले चलते है।
दूर।
तो क्या तुम मेरे साथ गाँव चलोगी, वहां हम खेतों में काम करेंगे और गन्ने और मक्के उगाएंगे
गाँव के लोगों ने कामचोरी में आकर ऐसी खेती करनी बन्द कर दी है या शायद वे उम्मीद करते करते ऊब गए हैं अब कुछ और नहीं, अब ईश्वर ही उनका एकमात्र सहारा है। वे अब मंदिरों और प्रार्थनाओं में अधिक मान्यताएं रखने लगे है। बजाए इसके कि वे खेती करते।
गाँव चलोगी क्या,
या अगर मन बदल जाए तो मैं तुम्हारे साथ गाँव को जाने के लिए बैठे ट्रक पर से अचानक उतरकर कहूँ
कि नहीं, नहीं। मैं अब गाँव नहीं जाना चाहता। चलो पहाड़ों पर चलते हैं जहाँ हमें कोई भी जानता नहीं। तो फिर भी तुम चलोगी क्या?
तुम मौन हो स्वप्न में मौन हो। पर तुम्हारी आँखें खुली हैं। पूरी की पूरी। तुम्हारी आँखों में दृश्य चल रहा होगा। दृश्य हमें मौन कर देते हैं फिर तुम कहती हो:
हाँ, चलो न। चलो कहीं भी। कहीं से उतर कर कहीं भी चले चलेंगे। मैं थोडा बहुत जितना भी जीना चाहती हूं वो बस तुम्हारे साथ। अगर हम पहाड़ों पर चले तो वहां एक स्कूल चलाएंगे। अब मुझे कभी-कभी बच्चों को पढ़ाने का मन करता है।
यह कहकर अकस्मात् तुम्हारी आँखों से नींद टपकती है बिस्तर किसी विशाल समुद्र में तब्दील हो जाता है।

मानसून की पहली बारिश है अलसुबह, अखबार बेचने वाला पुराने रेनकोट में आधा भीगते और चिल्लाते हुए कहीं से आ रहा है और कहीं को ओर चला गया। अखबारों में पता नहीं कैसी-कैसी ख़बरें हैं। कोई अच्छी खबर होती तो वह मेरे घर की बालकनी में भी अखबार फेंक जाता या पिछले महीने का बकाया मांगने आ जाता जब मैं या तुम अधखुली नींद में एक घण्टे बाद आने को कह देते।

नींद ऐसी टपकती है कि सब कुछ रेशम हो जाता है शहतूत के पौधे पर लगे फल मीठे हो जाते हैं और हम तोड़ते बीनते खाते जाते हैं। नींद टपकती आँखों के सामने न जाने किस फूल के पौधे पर तितलियाँ मंडरा रही हैं तितलियाँ ही हैं कि न जाने कुछ और और स्वप्न में नींद का ऐसा खुमार है कि तितलियाँ जान पड़ती हैं वे।

- आदित्य शुक्ल, गुडगाँव।

Thursday, 22 June 2017

समझने की जरूरत - धनञ्जय शुक्ल

काम करने के दो तरीके हैं, या तो व्यक्तिगत काम किए जाएं या फिर लोगों के साथ मिलकर। व्यक्तिगत कामों में दूसरा ऑब्जेक्ट की तरह होता है। लेकिन जब दूसरों के साथ मिलकर काम करते हैं तो कोई ऑब्जेक्ट नही होता । ऑब्जेक्ट काम ही होता है, वह काम करना पड़ता है । और इसका हमें चुनाव करना पड़ता है कि कौन सा काम करना है । जैसे जितने लोग हैं , उनके जीवन यापन के लिए आधार ढूंढना है । लेकिन उसमें तरह-तरह के लोग होते हैं जो अलग-अलग मांग रखते हैं । तो एक बाह्य अनुशासन निर्मित करना पड़ता है। यह अनुशासन ही नियम-कानून बन जाता है। जो राष्ट्रीय स्तर पर संविधान की तरह का काम करता है। इसके अलावा एक नैतिकता जन्म लेती है, जो हमें निर्देशित करती है। यदि हम इसे सबके हित में समझते हैं तो सहजता से करते हैं, नहीं तो विरोध करते हैं, और यह विरोध अंततः विद्रोह और क्रांतिकारी दिशा में चला जाता है । यह किसी भी विधा के साथ  है । अब अगर हम इतिहास पर ध्यान दें तो मनुष्य के विकास में तमाम तरह के पड़ाव आये हैं । जिनसे मनुष्य ने तमाम सीख ली है और उसके आधार पर मनुष्य ने तमाम व्यवस्थाएं खड़ी की है। साथ ही व्यवस्थाओं के विरोध करने वाले लोग भी हुए हैं। इस तरह से व्यवस्था निर्मित करने वालों और व्यवस्था के उखाड़ फेंकने वालों का एक पूरा ऐतिहासिक दस्तावेज मौजूद है । हर पीढ़ी के आने वाले लोग अपनी चेतना और अपनी समझ के अनुसार अपनी भूमिका चुनते रहते हैं, और दुनिया में हमेशा एक युद्ध जैसी स्थिति बनी रहती है। यह सब बहुत जटिल है लेकिन फिर भी इसे समझना हो तो उन लोगों की तरफ ध्यान जाता है जो इस पर काम कर रहे होते हैं । लोग उन्हें याद रखते हैं । मौखिक रूप से और किताबों के माध्यम से भी। और जब बात किताबों की शुरू होती है तो किताबें बहुत सी हैं, उन्हें लिखने वाले लोग बहुत से हैं , उन पर काम करने वाले लोग भी बहुत से हैं । और ऐसी स्थिति में जब कोई नया पढ़ने, समझने, लिखने वाला व्यक्ति, अपने आसपास की दुनिया और किताबों को देखता है तो उसके सामने यह समस्या खड़ी होती है कि वह किसे चुने और क्या पढ़े । जो सबके हित में हो, सबके हित में न भी हो तो , ज्यादा से ज्यादा लोगों के हित में हो । अब दो तरह के लोग दिखाई पड़ते हैं, एक वह जो अपने आपको आत्मज्ञानी कहते हैं। और एक वह जो तमाम तरह की चीजों पर शोध करते हैं और उसे सबके सामने रखते हैं । अब जबकि सब कुछ सब के सामने डिस्प्ले है, तमाम तकनीकी माध्यमों के द्वारा, तो अन्य कामों की अपेक्षा यह भी एक काम है कि इन सूचनाओं से, उन चीजों को कैसे निकाला जाए, जो अपने हित में हो , बल्कि पूरे मनुष्य के हित में हो । मनुष्य ही क्यों सभी के हित में हो,  यहां तक कि पर्यावरण के भी, वो हमसे अलग नहीं है । तो समझना समझाना बहुत ही महत्वपूर्ण काम हो जाता है । पहले स्वयं ही समझना फिर जो आपको सुन रहा हो उसे समझाना, समझाने की तरह नहीं समझाना , बल्कि बातचीत करते हुए समझने की प्रक्रिया से गुजरते हुए समझना । इस तरह की पहल कम से कम उन लोगों के लिए जरूरी काम है, जो इतने संवेदनशील हैं कि आस-पास क्या घट रहा है उसे समझ सकें । तमाम मोर्चो पर ऐसी चीजें घट रही हैं । जिसे न समझ पाने से हम सबका व्यक्तिगत और सामूहिक स्तर पर बहुत नुकसान हो रहा होता है । जैसे राजनीतिक फैसले, और एक राष्ट्र से दूसरे राष्ट्र के सम्बन्धों पर पड़ते हुए प्रभाव को समझने समझाने वाले लोग , यानि वैश्विक राजनीतिक समझ वाले लोगों की भूमिका । आर्थिक समझ रखने वाले लोग , और उन नीतियों को बनाने लोग , उससे हर एक व्यक्ति पर पड़ने वाले प्रभाव को समझने वाले लोग , इन सबको सरलता से समझा पाने वाले लोग । साहित्य की वे तमाम विधाएं जो यह बता पाती है कि समष्टि की क्रियाविधि का व्यष्टि पर किस तरह प्रभाव पड़ता है । उसके लिए काम करते हुए और छटपटाते हुए तमाम लोग किस तरह अपने जीवन को जी रहे होते हैं और तकनीक का असर कहाँ किस पर किस तरह पड़ रहा है और किन पर किस तरह प्रभाव डाला जा रहा है । यह सब समझने वालों को समझा जा सके। यह सब जरूरी काम हैं!

- धनञ्जय शुक्ल, लखनऊ

Monday, 19 June 2017

फिरोज़ा - शायक अलोक

अभी अभी आई है फिरोज़ा 
बिस्तर पर पटक कर बस्ता 
नहाने गई है 

मैं फिरोज़ा को नहाते हुए देखता हूँ रोज़ 
जानती है फिरोज़ा  
फिरोज़ा ने बताया था 
कितने और कैसे कैसे अलग होते हैं
लड़के और लड़कियां 
और हमने जीभ जीभ इमली चखा था...

बचपन में बताया तो गया था मुझे 
कि हिन्दुओं के एकदम उलट होते हैं मुसलमान 
और उसने तस्दीक भी कर दी 
हाँ, पर, स्वीकार नहीं किया मैंने ..

बुरी लड़की थी फिरोज़ा  
मुझे बताये बिना चली गयी 
सुना था 
निकाह कर लिया 
अपने ही किसी भाई से 
रहता था जो दूर दिल्ली में कहीं. 

उसी दिन मेरे लिए मर गयी फिरोज़ा  
मैंने चिन्हित भी कर दी 
उसके नाम की कब्र 
एक तीर वाला दिल अब भी दिखता है वहां 
मेरी रोपी नागफनी 
पूरे कब्रिस्तान में फैली है 

कब्रिस्तान की टूटी दीवार पर पैर नीचे लटकाए
मैं खाता हूँ मूंगफली 
वहीं खाली पड़ी कब्र में सर के बल खड़ी रहती है फिरोज़ा  

फिरोज़ा अब एक भूत है
नहीं लिखूंगा फिर उस भूत पर कविता..

- शायक अलोक, नई दिल्ली

रतजगा - सोमेश शुक्ल





जमाते उल्फत किस खिजाँ का क्या करिये
कभी उसको तो कभी खुदको आंका करिये

क्या अंजाम-औ-फक़त जी पे जब आ लगे ये जिन्दगी
इससे चूककर इसको, इसके निशाँ का करिये। 
- सोमेश शुक्ल, नई दिल्ली




हरियाली का गीत - शैलेन्द्र साहू

एक दिन के लिए ही सही
मनुष्य ने अपनी सारी कमज़ोरियों को
धूप में सूखने के लिए डाल दिया
और मछलियों ने इस पूरे किस्से को
किसी लोकगीत की तरह गुनगुनाया .

जबकि उम्मीद शब्द एक झुनझुना है
और हरियाली के गीत
हमेशा ही किन्ही उदास कवियों ने लिखा है

अगर इसे दूसरी तरह से कहूँ
तो मै ये देखता हूँ
की कहीं किसी सुदूर रेगिस्तान में
एक आदमकद आइना है रखा हुआ
जिस पर प्रतिबिंबित होती छवि
समूची कायनात है
और यकीन मानिए
मैंने उस पर कभी धूल की एक परत तक नहीं देखी

एक दिन के लिए ही सही
ऐसी ख़ुशफ़हमी भी क्या बुरा।


- शैलेन्द्र साहू, मुंबई