Thursday, 18 October 2018

हमारे जीवन की भीषण समस्याएं - मुरारी त्रिपाठी और गर्वित गर्ग

मेरी (मुरारी) और गर्वित की जिंदगी की भीषण समस्याएं - १

1- हमको नौकरी नहीं मिलती है।
2- जो मिल रही होती है, उसको लात मार देते हैं।
3- फिर उसके बाद उससे भी घटिया नौकरी के लिए आवेदन करना पड़ता है।
4- हमको पत्रकारिता करनी है।
5- पत्रकारिता बड़ी मेहनत का काम है।
6- पत्रकारिता सिर्फ टंकण और अनुवाद में सिमट कर रह गई है।
7- टंकण हम अभी तक सीख नहीं पाए हैं।
8- अनुवाद बहुत मुश्किल होता है।
9- सिगरेट सोलह रुपए की हो गई है।
10- गर्मियां आ गई हैं तो बियर आधे घंटे में गरम हो जाती है।
11- हमारे सिंक में छिपकली है तो हम बर्तन नहीं धो पाते हैं।
12- अगर भूख लगी हो तो चार फ्लोर उतर के खाना खाने जाना पड़ता है।
13- जेएनयू के मेस वाले हमको पहचान गए हैं इसलिए कूपन भी नहीं मिलता है और समय के बाद जाओ तो रोटियां खत्म हो जाती हैं।
14- हमारी हालत खराब रहती है लेकिन इमेज की वजह से सबको बोलना पड़ता है कि टेंशन मत लो, हमारी तरह बेफिक्र रहो।
15- हमारे दोस्तों की आपसी लड़ाइयों की वजह से हमारा शोषण होता है।
16- अपनी ऐसी- तैसी करवाने के बाद भी दोस्तों का कहना है कि हम उनकी कद्र नहीं करते हैं।
17- भावनात्मक पोस्टों पर सब ' हाहा' रियेक्ट करते हैं।
18- हमको दोस्तों की वाहियात कविताएं पढ़कर उनकी तारीफ करनी पड़ती है।
19- रूम में सिगरेट के बट्स इतने हैं कि फर्श नहीं दिखता है।
20- ट्राय किसी और लड़की पे करते हैं और हर बार समझ कोई और लेती है।

Saturday, 1 September 2018

अंधेरे की आंखें चमकती हैं

लघु कथा : आदित्य शुक्ल
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रोज-रोज खाने के लिए पैसे चाहिए थे। कम से कम जीवित रहने के लिए खाना जरूरी था। खाने के लिए पैसों का इंतजाम करना पडता था। 

जिसके लिए वह रिक्शा चलाता था। 

रिक्शा चलाना यूं तो बहुत कठिन काम नहीं था पर जितना श्रम करना पडता था उसके लिहाज से कमाए हुए पैसे कम जान पड़ते थे। कम इसलिए भी जान पड़ते होंगे क्योंकि ज्यादा पैसों की जरूरत पड़ जाती थी हर महीने। जो पैसे मिलते थे, उसी में खाना, घर भेजना, दारू पीना आदि करना पड़ता था। रहना सबसे कठिन था। फिर भी रहना पड़ता था। दिन रिक्शा चला-चलाकर गुजार दिया करता था वह। रिक्शे पर कभी-कभी खूबसूरत लडकियां बैठती थीं। लड़कियों के लिए रिक्शा चलाने में कुछ तो आनंद होता ही होगा, ऐसा अनुमान किया जा सकता है। 

वह और उसके साथी लड़कियों पर फिकरे भी कसते थे गाहे-बगाहे। लड़कियां उनसे नफरत करतीं थीं। कुछ रिक्शे वाले शरीफ होते थे। वह शरीफ नहीं था। 

उसकी एक बीवी थी। एक छ: साल की बेटी भी थी। उसे अंधेरी चमकती रात में बीवी की बहुत याद आती थी। उसकी बीवी उसके मानकों में बहुत सुंदर थी। लेकिन वह अपनी सुंदर पत्नी से प्रेम करता था यह निष्कर्ष निकलना कठिन है। वह अपनी बेटी से जरुर प्रेम करता था। वह उसे डॅाक्टर बनाना चाहता था। 

मेरी बेटी शोभा पढ़ने में तेज है और वह डॅाक्टर जरुर बनेगी, वह अक्सर सोचा करता और खुश हो जाता। 

उसकी बीवी, उसे उसके दोस्त अकरम के फोन पर फोन किया करती। वह बीवी से ज्यादा अपनी बेटी से बातें करता था। बीवी से बात करने लिए ज्यादा कुछ होता भी नहीं था। क्या पता कब क्या मांग बैठे। नई साड़ी, नथनी, भाई की शादी में पहनने के लिए चूड़ियों का सेट। बच्ची के पास अभी ज्यादा मांगे नहीं थी। उसके पास अपना फोन भी नहीं था। यह कहानी उस समय की कहानी रही होगी जब सबके पास फोन नहीं हुआ करते रहे होंगे। 

वह अपना खाना खुद बनाता था। रहना कठिन होने को बावजूद वह एक कमरे वाले एक छोटे से घर को किराये पर ले रखा था। उस कमरे में रहना वैसा ही था जैसे कि किसी की मृत्यु हो जाए और हम चुपचाप सिसक सिसक रोएं। उसके एक छोटे से कमरे में एक छोटा सा गंदला स्टोव था। उसके पास एक कूकर, एक कड़ाही और एक तवा था। कुछेकऔर बर्तन होंगे ही उसके पास। कुल मिलाकर उन्हें रखने की जगह नहीं होती थी उस कमरे में। बर्तन इधर उधर पड़े रहते। कमरे में एक-आध चूहे भी रहे ही होंगे उस समय। अंधेरे में  उनकी आंखें चमकती थीं। नहीं-नहीं चूहों की आंखें शायद नहीं चमकती। वह कोई बिल्ली रही होगी। 

उसकी बेटी कुछ दिनों से बीमार थी। उसे बुखार सा हुआ रहता था। चौराहे के डॅाक्टर  को दिखाया था उसकी बीवी ने। डॅाक्टर बुखार की दवाईयां देता था। बुखार उतर जाता। दो तीन दिन मामला ठीक रहता फिर बुखार उपट आता। महीने भर से यह क्रम चल रहा था। बुखार था, बुखार ठीक हो जाते हैं। बच्चों को तो समय समय पल बुखार होना ही चाहिए। वे बिना चप्पल पहने घूमते हैं। धूल-मिट्टी खेलते हैं। बुखार हो जाने पर कम से कम वे चुपचाप बिस्तर पर वेटे लेटे दीवारें तो देखते रहते हैं। दिवारों पर बहुत कुछ लिखा रहता है जिसे सिर्फ बच्चे ही पढ़ सकते हैं। बड़े होने पर वो यह सब भूल जाते हैं। 

उस दिन शाम को अकरम  के फोन पर फोन आया था। हमेशा की तरह उसने अपनी बीवी से कम बातें की। उस दिन खबर आई थी कि उसका बेटी को अब बुखार न रहा है। अब उसकी सांसे बंद हो गई हैं। अंत समय में उसने पापा पापा कहा था। फोन भी तुरंत नहीं मिल पाया था। उसठी सांसें ठीक छ: बजे बंद हुईं थीं जब वह दारू पी रहा था। जब वह दारू पी रहा था, एक घूंट उसके गले में जाकर अटक गई थी। ठीक उसी समय उसके बेटी की सांसे बंद हुई होंगी।तब उसे दारु पीते हुए अजीब सा लगा था। हिचकी भी आई थी। शायद एक हिचकी के साथ उसकी सांस भी निकल गई होगी। 

वह रोया नहीं। शायद दारू का प्रभाव था। अभी घर जा पाना भी संभव नहीं था। कोई ट्रेन, कोई बस नहीं थी इस टाइम। रात घिर आई थी। याद है उसे बचपन में एक बार उसकी गाय मर गई थी। गाय को जलाया नहीं गया। शायद बच्ची को भी न जलाया जाए। वह सुबह की ट्रेन से घर जा सकेगा। अभी अभी उसके पंख से उग आये हैं। वह थोड़ा सा उड़ा था। आसमान सांवला सा है अभी। उस पर एक चांद है। वह अपने कमरे से उड़कर सीधा गांव पहुंच जाएगा। वहां उसकी बेटी बुखार में तप्त कमरे की छत घूर रही होगी। बच्चों को कमरे की छत घूरनी चाहिए। छतों दीवारों पर लिखा हुआ बहुत कुछ सिर्फ बच्चे पढ़ पाते हैं। 

नहीं, नहीं किसी ने उसके पंख काट दिये हैं। वह गिर पड़ा है। वह गिर रहा है। छत से नहीं, आसमान से भी नहीं, फर्श से नीचे। फर्श से भी नीचे। फर्श पर बर्तन पड़े हैं। बर्तन में जूठन। जूठन पर कीड़े। काले/नीले//भूरे/गंदे कीड़े। 

उसके पंख जहां से कट गए थे, वहां से खून बह रहा है। एक छोटी सी प्यारी बच्ची दीवारों पर लिखा हुआ सा कुछ पढ़कर गुनगुना रही है।

धनञ्जय शुक्ल की एक कविता

**  दुःख फिर भी आसपास मंडराता रहता है **

अंततः हमें मरना होता है
और उसके पहले तमाम लोगों को मरते हुए देखना भी पड़ता है
यदि हम इसे सहजता से स्वीकार नहीं पाते
तो इसका भी दुख रहता ही है
बहुत से लोग बूढ़े भी नहीं हो पाते
बीच में ही उनकी सांसे टूट जाती हैं
लेकिन लगातार चीजों और लोगों के छीजते जाने को नियति की तरह स्वीकार करने पर
दुख फिर भी आसपास मंडराता रहता है
और एक चीज जो जन्म से मृत्यु तक पीछा नहीं छोड़ती
वह है तरह-तरह की बीमारी
अपनी और अपने आसपास के लोगों की
यदि उसे भी धैर्यपूर्वक सहते, समझते हुए जीना नहीं सीखा
तो दुख की चहलकदमी बढ़ती चली जाती है
हलांकि यह सब बहुत भौतिक दुख है
जबकि संस्कृति और सभ्यता के सहारे
हमने बहुत से आत्मिक दुख भी निर्मित कर लिए हैं
जिनको सीखने समझने के दौरान के दुख तो हैं ही
उससे बाहर निकल पाने के उपक्रम में भी बहुत से दुख हैं
और बहुत से दुख तो हमारे नायकों ने खड़े कर दिए हैं
वे चाहे किसी भी विधा के हों
मसीहाओं से लेकर खिलाड़ियों तक ।


धनंजय शुक्ल

Sunday, 4 March 2018

दो कविताएं - पाब्लो पांडे

१) वृद्ध प्रेम

तुमने उस स्त्री से प्रेम किया

और उसी के हो रहे.

उसके देह जाल से बाहर-तुम्हारे कोढ़ नहीं फूटे.

उसकी गंध में बिचरते, मछलियों से खेलते
चखते ,आतप तन, तुम्हारे तालु - खारा जल
और तुम्हारी भींगी नाक और होंठ और इतना रुधिर,
लाल सब, जँघाएँ, तलवे, पीठ, इतना रुधिर.
सब भुज पार किए तुमने, चूमे सब त्रिकोण,
ऊष्णता से भींगी बाहें, रात्रि-वश किए सब जतन प्रयोजन
दुनिया सम-कोण, उदित मुदित वक्ष, बिस्तर और क्रियाऐं.
यात्राएँ कंधे से कटि और ध्वनि, साँसे जितनी,गीलीं, उखड़ीं.

जहाँ तुम नहीं चाहते,श्वेत वे केश भी हुए जाते तुम्हारे,

क्षण क्षण जीवन पगुरता-इठलाता,दरवाज़े से बाहर जाता.
यौवन समुद्र तट पर खड़ा ताकता है. रोज़ तुम्हारे मन में एक
पहाड़ जागता है.

तुमने उस स्त्री से जितना भी प्रेम किया.

सिर्फ़ ख़ुद से किया. सिर्फ़ अपने बारे में सोचा.
और मान लिया कि उसी के हो रहे.


२) मैं अपने आप से प्रेम करता हूँ


मेरा शरीर मुझे बहुत प्रिय है

मेरी आत्मा कभी मैली नहीं होती,
मेरे कानों के पीछे जो गंदगी जमती है
मेरे केश बुहारते हैं उसको हर जाड़े,
मेरा पसीना देहों से लिपटता हुआ
क़तरा क़तरा प्रेम करता है
मेरा पुरुषत्व कसमसाता है
पराए शरीरों में जाता हुआ
लौट आता है फिर अपनी ओर,
जैसे पक्षी निकलते हैं ठंडे देशों से
और लौट आते हैं गरमाहट लिए वापस …
रात का विस्तार टूटता है बार बार
एक स्त्री फिसलती है
अपनी ही गर्दन से अपनी कमर की ओर
सटाए अपने स्तनों से मेरे होंठ
चीख़ती है बार बार पाब्लो, पाब्लो ,
 मेरे पाब्लो ओह मेरे पाब्लो ...
मैं अपना नायक हूँ,
बार बार पूजता हूँ अपनी रग रग
बजता हूँ अनंत के एक एक राग में,
देर देर तक,
लिपट लिपट जाता अनगिनत जीवनों से
लत्तरों से, सिवारों से, नावों के तलों से-
जहाँ जहाँ फूटता है जीवन वहाँ वहाँ
आसमान बन कर बरसता हुआ घास के मैदान पर -

एक स्त्री अपने दाँतो से काटती है मेरे कंधे

रिसता है ख़ून, मेरी जीभ पर गीलापन ठहरा हुआ -
वैसा ही एहतियात जैसा बाँस की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए
वैसी ही लचक, वैसा ही संतुलन.
वह झील की तरह डुबा लेती है मुझे
और मैं सो जाता हूँ, उसकी काँखों में दबाए अपनी गर्दन.

पाब्लो फिर भी जागता है उस स्त्री के स्वपन में

और मैं अपने आप से बहुत प्रेम करता हूँ.


(पाब्लो पण्डे, दिल्ली २०१७) 

Thursday, 1 March 2018

एनरिके विला-मतास : एक इंटरव्यू

•'नेवर एनी एंड टू पेरिस' में आप अपनी युवावस्था का प्रयोग करके रचनात्मकता, प्रभाव और पहचान जैसे सवालों का अन्वेषण करते हैं। जिसमें कथावाचक खुद एक लेखक है जिसके जीवन की घटनाएं और तथ्य आपके जीवन से मेल खाती हैं, जो - मेरा मानना है कि - आप ही हैं और आप नहीं भी हैं। क्या आपको लगता है कि कला को वास्तविकता के साथ समझौता करना पड़ता है?
- कैसी वास्तविकता? अगर आप पारम्परिक 'उपभोगवादी वास्तविकता' की बात कर रहे हैं जो किताबों के बाज़ार को चला रहा है, जिसे गल्प का प्राथमिक परिवेश बना दिया गया है तो उसमें मेरी कोई दिलचस्पी नहीं। मेरे लिए उपभोगवादी वास्तविकता से अधिक महत्वपूर्ण सत्य है। मेरा मानना है कि गल्प एकमात्र ऐसी चीज है जो मुझे उस सत्य के पास ले आती है जिसे उपभोगवादी वास्तविकता धुँधली करती है। वह महान किताब अभी लिखी जानी बाकी है जो महान सत्य के विकास में अभी भी एक मिसिंग चैप्टर जैसा है। इस तलाश में उन सबको शामिल किया जा सकता है - कर्वेन्ट्स से लेकर काफ़्का और मूसिल तक - जिन्होंने झूठ और नकलचियों की वृहद सत्ता के खिलाफ लगातार संघर्ष किया। उनके सँघर्ष में हमेशा ही एक स्पष्ट पैराडॉक्स रहा, क्योंकि वे ऐसे लेखक थे जो गल्प में कान तक डूबे थे। उन्होंने गल्प के सहारे सत्य की तलाश की। और इस स्टाइलिश तनाव की मदद से उन्होंने सत्य की एक अद्भुत झलक पेश की और साथ ही आधुनिक साहित्य का श्रेष्ठ हिस्सा रचा।
•यह भाव बहुत हद तक वैसा ही है जो आप अपने उपन्यास पेरिस में जाहिर करते हैं - 'जहां मरीचिका है, वहीं जीवन है' - और यह मुझे आपके एक इंटरव्यू की याद दिलाता है जिसमें आप कहते हैं : आधुनिक रचनाकारों के लिए सत्य की तलाश ऋजु रैखिक है, जॉयस के यूलिसस से ठीक उलट, जहां पर तलाश वृत्तीय थी। आपके साहित्य में क्या चीज आपके इस तलाश को उकसाती है?
- विम वेंडर्स की एक फ़िल्म में निकोलस रे कहता है 'तुम अब वापस घर नहीं जा सकते.' कभी कभी मैं इस बारे में सोचता हूँ और खुद को शांत करने के लिहाज से मैं खुद को एक ऐसे चाइनीज की तरह पाता हूँ जो घर लौट आया है। 'मैं महज एक चाइनीज हूँ जो घर लौट आया है', काफ्का एक पत्र में लिखते हैं। कभी कभी मेरी इच्छा होती है कि मैं भी यह चाइनीज होता, लेकिन सिर्फ कभी कभी। क्योंकि सच्चाई ये है कि मैं जो कुछ भी लिखता हूँ वह मुझे एक ढ़लान की ओर ले जाती हूं, एक आंतरिक यात्रा की ओर, रात की सैर की तरह, जो कि इठाका लौटने का ठीक उल्टा है। संछिप्त में, मैं एक अंतहीन यात्रा की इच्छा करता हूँ, हमेशा कुछ नए की तलाश में। हमेशा चौकन्ना।
•आपकी किताबें हेमिंग्वे की किताबों से अलग हैं, और आपके प्रिय लेखकों - जैसे कि बोर्हेस, काफ़्का, मूसिल भी हेमिंग्वे जैसा नहीं लिखते। तो आप जब पेरिस गए तो आपने हेमिंग्वे का अनुकरण क्यों किया, और अब उनके बारे में क्या सोचते हैं?
- मैं आज भी उनको एक कथाकार और भाषा निर्माता के रूप में पसन्द करता हूँ। लेकिन सच यह है कि हेमिंग्वे मेरे पसंदीदा लेखकों में नहीं हैं। लेकिन, जब मैंने पन्द्रह साल की उम्र में अ मूवेबल फीस्ट पढ़ी थी बार्सिलोना के उन स्थानीय दिनों में, तो इस किताब ने मुझमें पेरिस जाने और हेमिंग्वे की तरह 'एक लेखक का जीवन' जीने की इच्छा बो दिया। कुछ चार एक साल बाद असल में मुझे एक लेखक का जीवन जीने का मौका मिला जब मैंने मार्गरीट दुरास से एक गैरेट किराए पर लिया। और अब, जैसा कि हेमिंग्वे कहेंगे कि वे पेरिस में 'गरीब और बहुत खुश थे', (जैसा कि उन्होंने अ मूवेबल फीस्ट में स्वीकार किया है), उनसे ठीक उलट मेरा अनुभव यह है कि मैं गरीब और नाखुश रहा। हलांकि, नेवर एनी एंड टू पेरिस लिखने के काफी समय बीत जाने के बाद अब मेरा दुःख वाकई एक शानदार दावत बन गया है - मेरी स्मृति और मेरी कल्पनाओं के संदर्भ में।
•बेचैनी आपकी रचनाओं में क्या भूमिका अदा करती है?
- जब अंधेरा होता है तो हमें हमेशा किसी की जरूरत पड़ती है। यह ख्याल, बेचैनी का उत्पाद, मेरे पास सिर्फ शाम को लौटता है जब मैं अपनी लेखकीय गवेषणा खत्म कर चुका होता हूँ। हलांकि दिन बिल्कुल अलग होते हैं। लिखते हुए मैं अपनी बेचैनी और पीड़ा पर नियंत्रण रख पाता हूँ, जिसके लिए मुझे अपने ह्यूमर और आयरनी को धन्यवाद देना चाहिए। लेकिन हर रात मैं एक ऐसी बेचैनी के हवाले हो जाता हूँ जो कोई आयरनी नहीं जानती, और मुझे अगले दिन की प्रतीक्षा करनी पड़ती है जब मैं अपनी पीड़ा ऑयर ह्यूमर के फ्यूजन को फिर से ढूंढ सकूं जिससे मेरे लेखन का चरित्र तय होता है और जिससे मेरे लेखन में स्टाइल आता है। 'खुशी का स्टाइल,' जैसा कि कुछ आलोचकों ने पुकारा है इसे।
एनरिके विला-मतास एक इंटरव्यू में स्कोट एसपोसितो के साथ। स्पेनिश से अंग्रेजी अनुवाद है  स्कोट एसपोसितो का और अंग्रेजी से हिंदी तर्जुमा - आदित्य।
साभार - पेरिस रिव्यु।
एनरिके विला-मतास (स्पेनिश उपन्यासकार )