कितनी रात हो गई है। हवा धीरे से इस लाईब्रेरी के जर्जर किवाड़ों से टकराती है। मानो हिमालय की कंदराओं से कोई आत्मा कुछ पढ़ने आई है। लालटेन की जलती हुई लौ, सीलन लगी दीवारों पर चहलक़दमी करती है।
अलस्सुबह मैं ऊठूँगा और जिस किताब पर जमी गर्द के साथ छेड़छाड़ की गई हैं, उसे उठाकर आगे बढ़ जाऊँगा; फिर किसी एक गुमनाम और भूतहा लाईब्रेरी की तलाश में।
दरअसल ये लाईब्रेरियाँ एक जंक्शन की तरह हैं. मानचित्र की तरह। आत्माओं के अंडरवर्ल्ड में प्रवेश बिंदू सी, अवैध जुआघर सी, मेरे साथ-साथ ये खुद भी इस अंधेरी दुनिया के सरगना की तलाश में हैं।
उस बूढ़े लाईब्रेरियन ने कहा, -तुम पुस्तकें यहीं पढ़ सकते हो। बाहर ले जाने के लिए वो तुम्हें नहीं मिलेंगी।
मैंने पूछा, - क्यों?
बूढ़ा रहस्यमय ढंग से बोला- क्योंकि वे सभी गर्भवती हैं.
(आज की रात यहीं. द्वितीय विश्वयुद्ध के समय की चर्च जो कालांतर में एक खंडहरनुमा लाईब्रेरी में बदल गई. 88 साल का बूढ़ा, अंगीठी और लाइब्रेरी के पीछे पहाड़ की ढ़लान पर पाँच कब्रें। इसी बूढ़े के परिवार की।)
'बूढ़े लाइब्रेरियन' से वार्तालाप जारी है, वह कहता है-
"किताबें सामूहिक और व्यक्तिगत रूप से क्रमश: सभ्यता और लेखक की अस्थियाँ होती हैं| अपनी मृत्यु के बाद भी लेखक कहीं न कहीं फँसा रह जाता है| हाँ, किताबों में, अपनी तरल तरह की अवस्था में| उनकी मुक्ति ज़रूरी है|"
"तो फिर आप इतने सालों से इनका सरंक्षण क्यों कर रहे हैं?" मैंने लाईब्रेरी में रखी किताबों की ओर इशारा करते हुए पूछा|
बूढ़ा कुछ देर चुप रहा फिर जैसे कुछ तय करता हुआ सा बोला- "मैं हर रात एक किताब अंगीठी में जला देता हूं| मेरी सर्दियाँ ऐसे ही गुजरती हैं|"
अचानक मेरे नथूनों से जैसे जले हुए माँस और खून की बू टकराई हो| मैं तेज़ी से खिड़की की तरफ़ भागा|
(वैसे जो भी हो, यह बूढ़ा मुझे पसंद आ रहा है|)
मुझे लगा बूढ़ा इन सब चीज़ों से अनभिज्ञ होगा| मैं मनुष्य और प्रकृति के बिगड़ते संबंधों और विज्ञान पर चर्चा नहीं करना चाहता था| मैंने विषयांतर करना चाहा, लेकिन बूढ़े ने मुझे टोक दिया| वह काले आकाश में कहीं दूर झांकते हुए बोला- "पृथ्वी हमारा घर नहीं है| हम सब वहीं जा रहे हैं|"
अगर सेबों के बाँझ पेड़ों का वह झुरमुट नहीं होता तो लाइब्रेरी की खिड़की से वो पाँचों कब्रें साफ़ दिखाई देतीं|
किसी उनींदी प्रेमिका की तरह, मेरे सहारे के साथ-साथ वह बूढ़ा बड़ा धीरे-धीरे चल पा रहा था|
"ये सेब के पेड़ बाँझ क्यों हैं?" कब्रों के पास पहुँचते ही मेरा पहला सवाल|
"क्योंकि वो भी मेरे परिवार के सदस्य हैं|" बूढ़े के स्वर में भारी अफ़सोस था, मानो जैसे वह खुद से ही नाराज़ हो, कि वह अनाथ क्यों नहीं था|
कब्रें बहुत बुरी हालत में थीं| आधी-अधूरी उधड़ी हुई| मैंने बूढ़े की तरफ़ भूकम्प की तरह देखा|
"लाशों को दफ़नाने के कई सालों बाद, जब मुझ पर अकेलेपन के दौरे पड़ने लगे तो एक रात मैं कुदाल उठाकर यहाँ चला आया| हालांकि अधूरेपन ने यहाँ भी मेरा पीछा नहीं छोड़ा और उस रात के हिमपात ने मेरे काम में बाधा डाल दी| मुझे याद है उस साल सेब बहुत सड़े थे| शायद किसी मुल्क ने तुम्हारे देश पर हमला भी किया था|" इतना कहकर बूढ़ा चुप हो गया और अपनी साँसों को नियंत्रित करने लगा|
"फिर......अधूरा क्यों?......आप कुदाल का प्रयोग फिर से कर सकते थे| क्या आप पर फिर कभी वो दौरे नहीं पड़े?"
"वह शीत युद्ध का दौर था| विज्ञान ने मेरे अध्यात्म को निर्ममता से कुचल दिया| विज्ञान की किताबों ने मुझे यक़ीन दिलाया कि आत्मा जैसा कुछ नहीं था| यह सचमुच बहुत दर्दनाक था| मृत्यु का कोई उद्देश्य ही नहीं बचा| (आज से पहले) मैंने फिर कभी भी इन कब्रों की तरफ़ झांककर नहीं देखा| उसके बाद से ही कविताएं फिर कभी मेरे अंदर से नहीं फूटीं| हालांकि उससे कोई फर्क़ नहीं पड़ने वाला था क्योंकि मैं अपनी रचनाओं का इकलौता पाठक था| काश हम जंगल के जानवर की तरह एक निरी और महीन सी अज्ञानता में मरते|" इतना कहकर बूढ़ा अपने चेहरे पर एक फक़ीरी सी मुस्कान ले आया मानो जैसे वह जीवन के सौन्दर्य पर कै करने की कोशिश कर रहा हो|
"इतना निराशावाद भी ठीक नहीं|" मैंने बूढ़े के हाथों को अपने हाथों में दबाते हुए कहा|
"मैं तुम्हें नहीं जानता| मुलाक़ात समाप्त हुई और तुम्हारा प्रवास भी| अब तुम जा सकते हो|" बूढ़े के तेवर बदल गये थे|
कुछ दूर जाकर बूढ़ा रूका और मेरी तरफ़ पलटते हुए बोला- "निराशावाद!.........क्या जानते हो तुम निराशावाद के बारे में? सुनो!........धरती की तरह मैं भी सिर्फ़ तीस साल का था जब पहली बार आत्महत्या का विचार मेरे जेहन में आया| उस विचार ने लगभग छ: दशकों तक रात-दिन मेरा पीछा किया, लेकिन मैं अपनी स्वाभाविक मौत मरा| और तुम बात करते हो निराशावाद की|"
(पहाड़ से नीचे उतरते हुए मुझे तलहटी के एक गाँव के लोगों ने बताया कि तुम तीन दिन तक किसके साथ थे? उस लाईब्रेरी में तो कोई नहीं रहता|)
[मनाश ने यह कथा अंश अपने फेसबुक वॉल पर ही लिखा था जिसे यहां पर सम्पादित करके लगाया जा रहा है। वे इस कहानी को एक मुकम्मल विस्तार देने में संलग्न है और आशा है कि जल्द ही हमें यह रोचक कहानी अपनी संपूर्णता में पढ़ने को मिलेगी।]