Monday, 19 June 2017

हरियाली का गीत - शैलेन्द्र साहू

एक दिन के लिए ही सही
मनुष्य ने अपनी सारी कमज़ोरियों को
धूप में सूखने के लिए डाल दिया
और मछलियों ने इस पूरे किस्से को
किसी लोकगीत की तरह गुनगुनाया .

जबकि उम्मीद शब्द एक झुनझुना है
और हरियाली के गीत
हमेशा ही किन्ही उदास कवियों ने लिखा है

अगर इसे दूसरी तरह से कहूँ
तो मै ये देखता हूँ
की कहीं किसी सुदूर रेगिस्तान में
एक आदमकद आइना है रखा हुआ
जिस पर प्रतिबिंबित होती छवि
समूची कायनात है
और यकीन मानिए
मैंने उस पर कभी धूल की एक परत तक नहीं देखी

एक दिन के लिए ही सही
ऐसी ख़ुशफ़हमी भी क्या बुरा।


- शैलेन्द्र साहू, मुंबई