Saturday, 1 September 2018

धनञ्जय शुक्ल की एक कविता

**  दुःख फिर भी आसपास मंडराता रहता है **

अंततः हमें मरना होता है
और उसके पहले तमाम लोगों को मरते हुए देखना भी पड़ता है
यदि हम इसे सहजता से स्वीकार नहीं पाते
तो इसका भी दुख रहता ही है
बहुत से लोग बूढ़े भी नहीं हो पाते
बीच में ही उनकी सांसे टूट जाती हैं
लेकिन लगातार चीजों और लोगों के छीजते जाने को नियति की तरह स्वीकार करने पर
दुख फिर भी आसपास मंडराता रहता है
और एक चीज जो जन्म से मृत्यु तक पीछा नहीं छोड़ती
वह है तरह-तरह की बीमारी
अपनी और अपने आसपास के लोगों की
यदि उसे भी धैर्यपूर्वक सहते, समझते हुए जीना नहीं सीखा
तो दुख की चहलकदमी बढ़ती चली जाती है
हलांकि यह सब बहुत भौतिक दुख है
जबकि संस्कृति और सभ्यता के सहारे
हमने बहुत से आत्मिक दुख भी निर्मित कर लिए हैं
जिनको सीखने समझने के दौरान के दुख तो हैं ही
उससे बाहर निकल पाने के उपक्रम में भी बहुत से दुख हैं
और बहुत से दुख तो हमारे नायकों ने खड़े कर दिए हैं
वे चाहे किसी भी विधा के हों
मसीहाओं से लेकर खिलाड़ियों तक ।


धनंजय शुक्ल

No comments:

Post a Comment