जोसेफ के. स्वप्न देख रहा था।
एक खुशनुमा दिन था और के. को टहलने की इच्छा हुई। मुश्किल से वह कुछ ही कदम चला था और एक कब्रगाह में पहुँच गया। रास्ते बहुत घुमावदार थे, विदग्ध और अव्यवहारिक थे, लेकिन वह उनमें से किसी एक पर धीरे से चल पड़ा जैसे कोई प्रवाह में असंतुलित रूप से फिसल जाता है। दूर से ही उसकी नजर एक नए कब्र के टीले पर पड़ी जहाँ वह रुकना चाह रहा था। कब्र के उस टीले ने उसे इतना अधिक सम्मोहित कर दिया था कि उसे वहां जल्द से जल्द नहीं पहुँच पाने की टीस होने लगी। बीच बीच में टीला उसकी दृष्टि से ओझल हो जाता था, क्योंकि उसकी दृष्टि बार बार उन बैनरों से बाधित हो रही थी जो एक दूसरे से काफी तेज गति से लड़-टकरा रहे थे, उन्हें कौन लेकर चल रहा था यह तो ज्ञात नहीं हो पा रहा था पर कोई तो बहुत उल्लासपूर्ण उत्सव जारी था।
जबकि वह अभी अपने रास्ते में ही था, उसने अचानक ही देखा कि वह टीले के पास ही पहुँच गया है और लगभग उससे आगे ही निकल रहा है। जल्दबाजी में वह घास के ऊपर उछला। पर चूंकि रास्ता उसके पैरों के नीचे से तीव्र गति से निकल रहा था, वह लड़खड़ाकर टीले के ठीक सामने अपने घुटनों के बल गिर गया। दो लोग कब्र के पीछे खड़े थे और अपने हाथों में समाधिलेख उठाए हुए थे, के. अभी वहां पहुंचा ही था कि उन्होंने समाधिलेख को इस तरह से फेंका मानो वह उस टीले में पहले से स्थापित हो रखी हो। झाड़ियों में से अचानक एक तीसरा व्यक्ति निकलकर आया जिसे के. ने एक कलाकार के रूप में पहचाना। वह एक ट्रॉउजर और बेढ़ंगे तरीके से बटन लगाए हुए शर्ट पहने था, उसके सिर पर एक वेलवेट की टोपी थी; उसके हाथों में एक साधारण सी पेंसिल जिससे वह हवाओं में कोई आकृति बना रहा था आते हुए।
पेंसिल हाथ में लिए हुए वह समाधिलेख के ऊपरी सिरे तक पहुँचा; पत्थर काफी ऊँचा था, उसे नीचे नहीं झुकना पड़ा, हलांकि उसे थोड़ा आगे की ओर आना पड़ा, क्योंकि कब्र का टीला जिसपर वह पैर रखने से बच रहा था, उसके और पत्थर के बीच आ रहा था। इसलिए वह अपने अंगूठों पर खड़ा हुआ और अपने बाएं हाथ से पत्थर के समतल सतह पर रखते हुए खुद को सीधा किया। एक आश्चर्यजनक कौशल का प्रदर्शन करते हुए उसने अपने साधारण से पेन्सिल से सुनहरे शब्द लिखे : 'यह समाधि', प्रत्येक शब्द स्पष्ट और सुंदर तरीके से उकेरे गये थे, पत्थर में गहरे खुदे हुए, और शुद्ध स्वर्ण में। जब उसने यह दो शब्द अंकित कर लिए थे, उसने कनखियों से के. की ओर देखा, जो उन पत्थर पर अंकित होने वाले शब्दों की व्यग्रता से प्रतीक्षा कर रहा था, जिसका कलाकार पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं था और पत्थर की ओर एकाग्र दृष्टि से देख रहा था। असल में वह फिर से लिखने को उद्धत हुआ, पर लिख नहीं सका, कुछ तो था जो उसे रोक रहा था, उसने पेंसिल छोड़ दिया और एक पुनः के. की ओर मुड़ा। इस बार के. ने इस बात पर ध्यान दिया कि वह बहुत अधिक शर्मिंदा था और फिर भी कुछ स्पष्ट कर पाने में असमर्थ था। जिससे के. भी शर्मिंदा हो गया, दोनों ने एक दूसरे को असहाय दृष्टि से देखा, उन दोनों के बीच एक भयानक नासमझी उत्पन्न हो चुकी थी जिसे दोनों में से कोई भी सुलझा पाने में असमर्थ था। और तभी कब्रगाह के चर्च से असमय घण्टियाँ बजने लगीं, लेकिन कलाकार ने हाथ उठाकर कुछ संकेत किया और घण्टियाँ बन्द हो गईं। कुछ देर बाद घण्टियाँ पुनः बजने लगीं, इस बार मद्धम स्वर में, बिना किसी आग्रह के मानो अपनी ही ध्वनि की परीक्षा ले रहीं हों। कलाकार की दशा देखकर के. खुद दयनीय महसूस करने लगा, रोना शुरू कर दिया और अपने हाथों से अपना चेहरा छिपाकर सुबकने लगा। कलाकार ने के. के चुप हो जाने की प्रतीक्षा की और फिर कोई और रास्ता न देखकर अंकण का काम जारी रखने का निर्णय लिया। के. ने जैसे ही कलाकार की पहली छोटी सी अंकण ध्वनि सुनी, कुछ राहत महसूस किया हलांकि कलाकार स्पष्टतः बहुत कठिनाई से यह कर पाया था और अंकण भी पहले की तरह सुन्दर नहीं बन पाया, क्योंकि उकेरे हुए में स्वर्णाक्षरों की कमी दिखाई दी, अनिश्चित और अदृढ़ तरीके से अंकण का हो रहा था और अंततः यह एक बहुत बड़ा अक्षर बन पाया। जो कि J था, जो लगभग लिखा जा चुका था, तभी कलाकार ने कब्र के टीले पर अपने एक पैर से जोर का प्रहार किया और चारों तरफ हवाओं में मिट्टी ही मिट्टी हो गई। अंततः के. को अब समझ में आया, लेकिन अब क्षमा-याचना के लिए बहुत देर हो चुकी थी, अपनी सभी उँगलियों को उसने धरती में धंसाया जिससे उसे कोई प्रतिरोध न मिला, मानो जैसे सब कुछ पहले से तैयार करके रखा हो, और मिट्टी की एक पतली सी परत जैसे सिर्फ ऊपरी भ्रम हो, जिसके ठीक नीचे एक विशाल खड्ड था, में के. गिर गया, उसके गिरने के बाद एक हल्की सी प्रतिध्वनि सुनाई दी। और जबकि वह खड्ड की अभेद्य गहराइयों में उतर रहा था, उसका सिर अभी भी सीधा था और जिससे उसकी गर्दन पर जोर पड़ रहा था, ऊपर समाधिलेख पर उसका नाम सुनहरे अक्षरों में जल्दी जल्दी उकेर दिया गया।
इस दृश्य से मंत्रमुग्ध होकर वह नींद से जाग उठा।
[एडविन और विला मूइर के अंग्रेजी अनुवाद पर आधारित हिंदी तर्जुमा: आदित्य शुक्ल]
एक खुशनुमा दिन था और के. को टहलने की इच्छा हुई। मुश्किल से वह कुछ ही कदम चला था और एक कब्रगाह में पहुँच गया। रास्ते बहुत घुमावदार थे, विदग्ध और अव्यवहारिक थे, लेकिन वह उनमें से किसी एक पर धीरे से चल पड़ा जैसे कोई प्रवाह में असंतुलित रूप से फिसल जाता है। दूर से ही उसकी नजर एक नए कब्र के टीले पर पड़ी जहाँ वह रुकना चाह रहा था। कब्र के उस टीले ने उसे इतना अधिक सम्मोहित कर दिया था कि उसे वहां जल्द से जल्द नहीं पहुँच पाने की टीस होने लगी। बीच बीच में टीला उसकी दृष्टि से ओझल हो जाता था, क्योंकि उसकी दृष्टि बार बार उन बैनरों से बाधित हो रही थी जो एक दूसरे से काफी तेज गति से लड़-टकरा रहे थे, उन्हें कौन लेकर चल रहा था यह तो ज्ञात नहीं हो पा रहा था पर कोई तो बहुत उल्लासपूर्ण उत्सव जारी था।
जबकि वह अभी अपने रास्ते में ही था, उसने अचानक ही देखा कि वह टीले के पास ही पहुँच गया है और लगभग उससे आगे ही निकल रहा है। जल्दबाजी में वह घास के ऊपर उछला। पर चूंकि रास्ता उसके पैरों के नीचे से तीव्र गति से निकल रहा था, वह लड़खड़ाकर टीले के ठीक सामने अपने घुटनों के बल गिर गया। दो लोग कब्र के पीछे खड़े थे और अपने हाथों में समाधिलेख उठाए हुए थे, के. अभी वहां पहुंचा ही था कि उन्होंने समाधिलेख को इस तरह से फेंका मानो वह उस टीले में पहले से स्थापित हो रखी हो। झाड़ियों में से अचानक एक तीसरा व्यक्ति निकलकर आया जिसे के. ने एक कलाकार के रूप में पहचाना। वह एक ट्रॉउजर और बेढ़ंगे तरीके से बटन लगाए हुए शर्ट पहने था, उसके सिर पर एक वेलवेट की टोपी थी; उसके हाथों में एक साधारण सी पेंसिल जिससे वह हवाओं में कोई आकृति बना रहा था आते हुए।
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| (काफ्का म्यूजियम, प्राग) |
इस दृश्य से मंत्रमुग्ध होकर वह नींद से जाग उठा।
[एडविन और विला मूइर के अंग्रेजी अनुवाद पर आधारित हिंदी तर्जुमा: आदित्य शुक्ल]
