Wednesday, 23 January 2019

वह बूढा

वर्षों बाद जब वह अपने गांव लौटा तो बूढ़ा हो चुका था। गांव में घुसते हुए उसे जो सबसे पहला दृश्य दिखा वह एक अन्य बूढ़े का था।जो टूटी खाट पर अभी अभी मरा था, उसके पास लोग इकट्ठा तो हो रहे थे लेकिन कोई रो नही रहा था। बल्कि अपेक्षित तैयारी के भाव से लोग इकट्ठा हुए थे। वह उसे जानता था, वह उसके बचपन का साथी था, तब अखाड़े में वही उसका प्रतिद्वंदी रहता था। वह उसके साथ श्मशान तक जाना चाहता था लेकिन गया नही। वह बचपन के अपने गांव में चला गया और अबके गांव से उसके सूत्रों को जोड़ने लगा। उसे लगा बदलाव जीवन का नियम है, यह अचानक समझ में नही आता, कम से कम गुणात्मक रूप से तो बिल्कुल नही। उसके लिए उम्र का गुजर जाना ही जरूरी था। उसकी स्मृति यात्रा दो तरफ जा रही थी। एक जो उसने गांव से अलग रहकर जीवन जिया और दूसरा जो उसके बगैर गांव जीता रहा। जबकि बाहर जो घट रहा था उस दृश्य में उसके लिए सब अजनबी थे। जिसे वह पहचान सकता था, अब वह वहां नही था और होता भी तो शायद बताने से ही याद कर पाता। उसको तुरन्त लगा, कोई गांव अपना गांव नही होता, जिनके साथ वो जन्मा होता है वही लोग उसके गांव होते हैं। लेकिन ऐसा नही था, जब वहां एक और बूढ़ा आया और उसे देखकर अपने साथ वाले नौजवान से बोला कि यह अजनबी तो फलां के लड़के से मिलती जुलती शक्ल वाला लग रहा है, तब उसके साथ के नौजवान ने उसके साथ जो बातचीत जारी रखी, उससे पता चला कि ऐसा नही है, गांव स्मृतियों में हर व्यक्ति को जिंदा रखता है और उसे एक भूमिका दे देता है। गांव उसे खोये हुए या फिर वापस लौटकर न आने वाले व्यक्ति के रूप में भी याद रखता है। असल में गांव जैविक इकाई की तरह होते हैं। वे शहरों की तरह रोजी-रोटी की तलाश में एकत्र हुए लोगों  का समूह भर नही होते। उसने किसी को अपना परिचय नही दिया, लेकिन अपने खानदान के नजदीकी लोगों को पहचानने की कोशिश करता रहा। जब वह गांव में घूम रहा था तो अपने बचपन के घर को मिट्टी के टीले के रूप में देखा, तो उसे लेखकों और कवियों को इस स्थिति में लिखे संस्मरण के उनके रोते हुए चेहरे बहुत जीवन्त से लगने लगे, आखिर आदमी भावनाओं का पुतला भी तो होता ही है।
        एक बूढ़ा बची हुई उम्र में आखिर क्या हौंसला रख सकता है? एक नई दुनिया से अपने आप को जोड़ लेने के लिए आखिर उसमें कौन सा बल सहयोग कर सकता है? उसने याद किया पिछले तीस साल से वह एक आश्रम के मुखिया के रूप में, उसने तमाम लोगों को जीवन के तमाम विषयों में जो सीख दी, वो झूठ था। उसने याद किया पचास साल पहले जब वह गांव छोड़कर गया था और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से जीवन देखने का जो अभियान शुरू किया था, वो असल में वैश्विक महत्वाकांक्षाओं का हिस्सा था। उसने निष्कर्ष निकाला कि उसका जीवन एक भटकाव का जीवन था, वह न तो छोटे से गांव का था, न ही बहुत बड़ी दुनिया का। उसने गांव को उस वक्त की जमीन पर खड़े होकर देखा, तमाम बदलाव के बावजूद जीवन की वही समस्या, वही प्रश्न अब भी लोगों के थे, जो उसके बचपन में उसके थे। तब उसके अपने लिए उसके पास कोई जबाब नही थे, अब गांव के किसी भी बच्चे को जबाब दे पाने के लिए भी उसके पास कुछ नही था। उसने अपने दिमाग में विश्व क्लासिक कही जाने  वाली तमाम किताबों के पन्नों को उड़ते हुए देखा।
           वह गांव में बिना किसी को अपना परिचय दिए वापस लौट पड़ा। जब वह गांव छोड़कर जा रहा था तब एक माँ अपने छोटे से बच्चे को हॉस्पिटल से मृत घोषित कर दिए जाने पर रोती बिलखती हुई वापस लौट रही थी !

               धनंजय शुक्ल