मेरे पास एक विचित्र जंतु है, आधा बिलौटा, आधा मेमना। यह मुझे मेरे पिता से विरासत में मिला था, लेकिन इसका ऐसा विकास मेरे जीवनकाल में ही हुआ है, पहले यह मेमना अधिक और बिलौटा कम था, लेकिन अब इसमें दोनों जंतुओं का समान भाग है। इसके सर और पंजे बिल्ली के हैं और इसकी आकृति आकार मेमने की है, इसकी आँखें दोनों जंतुओं की है, क्योंकि वे चमकते हैं और मद्दम भी हैं, इसके फर थोड़े मुलायम और घने हैं, इसकी चाल में दोनों के गुण हैं, थोड़ी फुर्ती और थोड़ी-सी लज्जा भी, धूप सेंकने यह खिड़की की देहरी पर बैठता है और गुर्राता है, खेतों में यह पागलों की तरह दौड़ता है और मुश्किल से पकड़ में आता है। यह बिल्लियों से बचता है और मेमनों पर कूद पड़ने की कोशिश करता है। चांदनी रात में यह छतों पर चलना पसन्द करता है, यह म्याऊं नहीं कर पाता और चूहों को नापसन्द करता है। यह मुर्गियों के बाड़े में घण्टों तक रह सकता है लेकिन इसने अब तक उन्हें मारने की कोई कोशिश नहीं की। मैं इसे मीठा दूध पिलाता हूँ, जो इसे बहुत पसंद है, जिसे यह अपनी भक्षक खंगों से चूसता है। हां, यह बच्चों के लिए वाकई सुनहरा दृश्य है। रविवार सुबह प्रदर्शनी का समय होता है - मैं इस छोटे जीव को अपनी गोद में रखता हूँ और समूचे पड़ोस के बच्चे मुझे आकर घेर लेते हैं। वे अजीबोगरीब प्रश्न पूछते हैं, जिसका उत्तर देने की जहमत मैं नहीं उठाता, लेकिन मैं उन्हें वह दिखाना पसन्द करता हूँ जो मेरे पास है। कभी-कभी बच्चे अपने साथ बिल्लियां लेकर आते हैं, और एक बार तो एक अपने साथ दो मेमने भी ले आया, लेकिन उनकी उम्मीदों के विपरीत, एक दूसरे को वे जंतु पहचान नहीं सके; जंतुओं ने अपनी जंतु-दृष्टि एक दूसरे को शांत मुद्रा में देखा, स्पष्टतः उन्होंने एक दूसरे के अस्तित्व को ईश्वर-प्रदत्त तथ्य मानकर स्वीकार कर लिया था।
मेरी गोद में बैठे जंतु में कोई भय नहीं होता, ना ही शिकार करने की कोई इच्छा। यह मुझसे सटकर बहुत प्रसन्न महसूस करता है। यह उस परिवार के प्रति वफादार है जो इसकी देखभाल करता है। मैं यह कहने का साहस करना चाहूंगा कि यह वफादारी कोई विशेष प्रकार की नहीं है, बल्कि एक जंतु की सिर्फ सच्ची अंतःप्रेरणा है, जिसके लिए इस पृथ्वी पर अनेकानेक सह-प्राणी हैं, लेकिन शायद एक भी करीबी खून का सम्बन्धी नहीं, और इसे हमारे साथ जो सुरक्षा मिली उससे इसे भय ही है। कभी-कभी मैं इसपर हँसता हूँ जब यह मेरे चारों ओर घूमता है, मेरे पांवों के बीच से गुजरता है और मुझसे अलग नहीं होना चाहता है। यह न तो बिल्ली का गुण है ना ही मेमने का, इसे तो अब लगभग श्वान तक बनने की इच्छा है। मैं इस बात पर गंभीरता से विश्वास करता हूँ कि इसके अंदर दोनों ही जीवों - बिल्ली और मेमने जैसी बेचैनी है, चाहे से भी वे कितने ही भिन्न क्यों न हों। इसीलिए यह अपनी ही त्वचा के भीतर असुविधा का एहसास करता है। शायद एक कसाई का चाकू इसे इसकी पीड़ा से मुक्ति दिला सके; परन्तु चूंकि मैंने इसे अपनी विरासत में हासिल किया ऐसा होने नहीं दूंगा।
[जॉन आर विलियम्स के अंग्रेजी अनुवाद से हिंदी तर्जुमा: आदित्य शुक्ल]
मेरी गोद में बैठे जंतु में कोई भय नहीं होता, ना ही शिकार करने की कोई इच्छा। यह मुझसे सटकर बहुत प्रसन्न महसूस करता है। यह उस परिवार के प्रति वफादार है जो इसकी देखभाल करता है। मैं यह कहने का साहस करना चाहूंगा कि यह वफादारी कोई विशेष प्रकार की नहीं है, बल्कि एक जंतु की सिर्फ सच्ची अंतःप्रेरणा है, जिसके लिए इस पृथ्वी पर अनेकानेक सह-प्राणी हैं, लेकिन शायद एक भी करीबी खून का सम्बन्धी नहीं, और इसे हमारे साथ जो सुरक्षा मिली उससे इसे भय ही है। कभी-कभी मैं इसपर हँसता हूँ जब यह मेरे चारों ओर घूमता है, मेरे पांवों के बीच से गुजरता है और मुझसे अलग नहीं होना चाहता है। यह न तो बिल्ली का गुण है ना ही मेमने का, इसे तो अब लगभग श्वान तक बनने की इच्छा है। मैं इस बात पर गंभीरता से विश्वास करता हूँ कि इसके अंदर दोनों ही जीवों - बिल्ली और मेमने जैसी बेचैनी है, चाहे से भी वे कितने ही भिन्न क्यों न हों। इसीलिए यह अपनी ही त्वचा के भीतर असुविधा का एहसास करता है। शायद एक कसाई का चाकू इसे इसकी पीड़ा से मुक्ति दिला सके; परन्तु चूंकि मैंने इसे अपनी विरासत में हासिल किया ऐसा होने नहीं दूंगा।
[जॉन आर विलियम्स के अंग्रेजी अनुवाद से हिंदी तर्जुमा: आदित्य शुक्ल]