Sunday, 4 March 2018

दो कविताएं - पाब्लो पांडे

१) वृद्ध प्रेम

तुमने उस स्त्री से प्रेम किया

और उसी के हो रहे.

उसके देह जाल से बाहर-तुम्हारे कोढ़ नहीं फूटे.

उसकी गंध में बिचरते, मछलियों से खेलते
चखते ,आतप तन, तुम्हारे तालु - खारा जल
और तुम्हारी भींगी नाक और होंठ और इतना रुधिर,
लाल सब, जँघाएँ, तलवे, पीठ, इतना रुधिर.
सब भुज पार किए तुमने, चूमे सब त्रिकोण,
ऊष्णता से भींगी बाहें, रात्रि-वश किए सब जतन प्रयोजन
दुनिया सम-कोण, उदित मुदित वक्ष, बिस्तर और क्रियाऐं.
यात्राएँ कंधे से कटि और ध्वनि, साँसे जितनी,गीलीं, उखड़ीं.

जहाँ तुम नहीं चाहते,श्वेत वे केश भी हुए जाते तुम्हारे,

क्षण क्षण जीवन पगुरता-इठलाता,दरवाज़े से बाहर जाता.
यौवन समुद्र तट पर खड़ा ताकता है. रोज़ तुम्हारे मन में एक
पहाड़ जागता है.

तुमने उस स्त्री से जितना भी प्रेम किया.

सिर्फ़ ख़ुद से किया. सिर्फ़ अपने बारे में सोचा.
और मान लिया कि उसी के हो रहे.


२) मैं अपने आप से प्रेम करता हूँ


मेरा शरीर मुझे बहुत प्रिय है

मेरी आत्मा कभी मैली नहीं होती,
मेरे कानों के पीछे जो गंदगी जमती है
मेरे केश बुहारते हैं उसको हर जाड़े,
मेरा पसीना देहों से लिपटता हुआ
क़तरा क़तरा प्रेम करता है
मेरा पुरुषत्व कसमसाता है
पराए शरीरों में जाता हुआ
लौट आता है फिर अपनी ओर,
जैसे पक्षी निकलते हैं ठंडे देशों से
और लौट आते हैं गरमाहट लिए वापस …
रात का विस्तार टूटता है बार बार
एक स्त्री फिसलती है
अपनी ही गर्दन से अपनी कमर की ओर
सटाए अपने स्तनों से मेरे होंठ
चीख़ती है बार बार पाब्लो, पाब्लो ,
 मेरे पाब्लो ओह मेरे पाब्लो ...
मैं अपना नायक हूँ,
बार बार पूजता हूँ अपनी रग रग
बजता हूँ अनंत के एक एक राग में,
देर देर तक,
लिपट लिपट जाता अनगिनत जीवनों से
लत्तरों से, सिवारों से, नावों के तलों से-
जहाँ जहाँ फूटता है जीवन वहाँ वहाँ
आसमान बन कर बरसता हुआ घास के मैदान पर -

एक स्त्री अपने दाँतो से काटती है मेरे कंधे

रिसता है ख़ून, मेरी जीभ पर गीलापन ठहरा हुआ -
वैसा ही एहतियात जैसा बाँस की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए
वैसी ही लचक, वैसा ही संतुलन.
वह झील की तरह डुबा लेती है मुझे
और मैं सो जाता हूँ, उसकी काँखों में दबाए अपनी गर्दन.

पाब्लो फिर भी जागता है उस स्त्री के स्वपन में

और मैं अपने आप से बहुत प्रेम करता हूँ.


(पाब्लो पण्डे, दिल्ली २०१७) 

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