Sunday, 3 December 2017

ईस्ट एंड - एनरिके विला-मतास

कैसा अनुभव होता है एक फिल्म देखना? क्या फिल्म (और दूसरी कलायें भी) हमें कई बार खुद के सामने ही नहीं ला खड़ा करतीं और ऐसे सवालों से रूबरू करातीं जिनसे हम बचते ही रहते हैं? कला अब एक नए आयाम पर आ पहुंची है| कला धीरे-धीरे सूक्ष्मता की ओर जा रही है| सिनेमा की दुनिया में, बहुत सारे फिल्मकारों ने तमाम तरह के प्रयोग किए हैं और सिनेमा की संभावनाओं को एकदम खोलकर रख दिया है| डेविड क्रोनेनबर्ग ऐसे ही एक आधुनिक फिल्मकार हैं लेकिन हम उन पुराने महान फिल्मकारों को कैसे भूल सकते हैं जिहोने चली आ रही परिपाटी से अलग सोचने का साहस किया और सिनेमा के तौर-तरीके बदल कर रख दिया! इन्हीं फिल्मकारों में से एक हैं - माइकलएंजेलो अंतोनियोनी| प्रस्तुत लघु कथा में, स्पेनिश कथाकार एनरिके विला-मतास इन्हीं दो फिल्मकारों के सहारे मनुष्य की पहचान, संवेदनशील मनुष्य और रूढ़िगत विश्व के बीच के सम्बन्ध और कलाओं तथा उनसे कला-रसिक के संबंधो की पड़ताल करते हैं| विला-मतास एक उत्तर आधुनिक कथाकार हैं और उन्होंने भी अपने तरीके से कथाकारी के तौर-तरीकों में भरपूर प्रयोग किया है| इस तरह का फिक्शन जहाँ आप यह अनुमान नहीं लगा सकते कि प्रस्तुत कथा, कोई कथा है या सत्य घटना.. कथा है या आलोचना.. यहाँ पर कला और यथार्थ के बीच की लाइन थोड़ी और धुंधली सी हो गयी है और कहन के नए आयाम खुले हैं- जिसे नाम दिया गया मेटा फिक्शन| तो लीजिये प्रस्तुत है विला-मतास की लघु कथा ईस्ट एंड, जिसका स्पेनिश से अंग्रेजी अनुवाद किया है सामंता श्नी ने और अंग्रेजी पर आधारित हिंदी अनुवाद आदित्य शुक्ल| 

ईस्ट एंड

बेल, डेविड क्रोनेनबर्ग की उस फिल्म की सीडी किराए पर ले आई है जो एकमात्र फिल्म मैंने नहीं देखी| यह फिल्म ‘एक एकाकी मनुष्य और रूढ़िगत विश्व के बीच की संवादहीनता’ पर आधारित है| पहले दृश्य में, मकड़ी युवक, जो कि नायक है, ट्रेन से उतरने वाला आखिरी यात्री, उसे देखते ही हम यह अंदाजा लगा लेते हैं कि वह दूसरे यात्रियों से भिन्न है| वह कुछ तो अन्यमनस्क सा है, एक छोटा और अजीब-सा सूटकेस हाथ में लिए हुए उतरते हुए लडखडाता है| वह आकर्षक है, लेकिन यह तो स्पष्ट है कि वह मानसिक स्तर पर विचलित है, एक अकेला आदमी इस उदासीन विश्व से कटा हुआ| बेल जानना चाहती है अगर मैंने इस बात पर ध्यान दिया हो कि गर्मी का मौसम होते हुए भी मकड़ी ने चार शर्ट पहने हुए हैं| असल में मैंने ध्यान नहीं दिया था| मैंने उससे माफ़ी मांगते हुए बताया कि मैं अब तक उस फिल्म पर ध्यान केन्द्रित नहीं कर पाया हूँ| और वैसे भी मैं इतनी महीनता से फ़िल्में नहीं देखता| लेकिन यह सच है| उसने कडाके की गर्मी में भी चार शर्ट पहने हुए हैं| और उसका सूटकेस? सूटकेस छोटा और पुराना है और उसमें कुछ व्यर्थ के सामानों के साथ एक छोटा नोटबुक है जिसमें वह बहुत बारीक अक्षरों में कुछ लिखता है|
बेल मुझसे पूछती है कि मकड़ी क्या लिख रहा है और पूछती है अगर मैंने इस बात पर ध्यान दिया हो कि ईस्ट एंड की उदास सड़कों पर मकड़ी के अलावे कोई नहीं है| असल में, जबसे फिल्म शुरू हुई है, बेल ने मुझसे सवाल पूछना बंद ही नहीं किया हैं|

‘तुमसे किसी ने यह पता करने को कहा है क्या कि मैं अब भी सारी दुनिया से एक व्यापक संवाद स्थापित कर सकता हूँ?’ मैंने उससे पूछा|  

बेल ने कोई जवाब नहीं दिया| मकड़ी सुनता हुआ प्रतीत हो रहा था, जैसे हमारी बातों को भी कनखियों से सुन रहा हो, यहं तक कि मेरे विचारों को भी| क्या मैं मकड़ी हूँ? मैं उसे कैमरे की ओर देखते हुए, अपना सूटकेस बंद करते हुए, और उदास निर्जन सडक पर चलते देखता हूँ| वह ऐसा व्यवहार कर रहा है जैसे हमारे कमरे में आ गया हो| वह ऐसे चल रहा है मानो लन्दन की सडकें बस यहीं घर के बाहर ही हों| मकड़ी एक मानसिक अस्पताल से निकलकर सैद्धांतिक रूप से एक बेहतर जगह, किसी घर या मनोचिकित्सा संसथान में जा रहा है, लन्दन की उन्हीं गलियों में जहाँ संयोग से उसका बचपन भी बीता था और जहाँ पर वह अपने बीती स्मृतियों का घातक पुनर्निर्माण करेगा| जिस समय मकड़ी अपने अतीत का पुनर्निर्माण कर रहा था मैं इस बात पर विचार कर रहा था क्या मनुष्य का जटिल मानसिक जीवन कभी भी बचपन की गलियों से मुक्त हो पाता है?

‘पागल लोग अजीब होते हैं’, बेल ने कहा| ‘लेकिन दिलचस्प होते हैं, तुम्हें ऐसा नहीं लगता?’

मुझे फिर से लगा कि वह यह जानना चाहती है कि मैं मकड़ी के बारे में क्या सोच रहा हूँ, जिससे वह मेरे पागलपन की तीव्रता का अंदाजा लगा सके| यह फिल्म एक मानसिक यात्रा है, ईस्ट एंड से होकर गुजरते हुए एक क्षतिग्रस्त आदमी की यात्रा| यहाँ हम जीवन को मकड़ी के अनुभव से देख रहे हैं, इस युवक, जिसके हाथ में एक अजीब सी सूटकेस और सूक्ष्म अक्षरों में लिखी हुई नोटबुक है, के दयनीय मानसिक ढ़ांचे पर लगे हुए फिल्टर से|
‘क्या तुमने ध्यान दिया वह अपनी नोटबुक में क्या लिख रहा है?’ बेल ने अगला सवाल किया|
अगर मैं घर पर अकेले मकड़ी फिल्म को देख रहा होता, तो पृष्ठभूमि में बॉब डिलन का गीत ‘मोस्ट लाइकली यू गो योर वे’ लगा लेता जो मुझे हमेशा ही सुकून देता है|

‘मैंने सिर्फ नोटबुक देखा है|’ मैंने जवाब दिया|

बेल ने फिल्म को रोक दिया ताकि हम देख सकें कि मकड़ी नोटबुक में क्या लिख रहा है| वे कुछ रहस्यात्मक सी बनावटें हैं, लकड़ी या टूथपिक, टुडे-मुड़े अधूरे से जो स्केच जैसे भी नहीं हैं, और स्वभावतः वे किसी भी वर्णमाला या चित्रलिपि का भी हिस्सा नहीं लगते| वे डरावने हैं| आप उन्हें कैसे भी देखें, ये लिखावट पागलपन की व्यर्थता का सम्पूर्ण खांका खींच देती हैं जिससे मुझे भय लगता है| शायद हम सबमें मकड़ी का कुछ हिस्सा होता हो| कभी-कभी मुझे मकड़ी से लगाव महसूस होता है जो मुझे एल देजर्तो रोस्सो की याद दिलाता है, १९६४ में माइकलेंजेलो अंतोनियोनी की बनाई वह फिल्म जिसमें मोनिका विट्टी एक भगोड़े का रोल अदा करती है, मकड़ी का स्त्री रूप, औद्योगिक इलाके में खोयी हुई एक औरत जो अपने आस-पास से कोई सम्बन्ध नहीं बना पा रही है|

मेरी दृष्टि में, स्पाइडर फिल्म एक रहस्यात्मक सन्दर्भ का माहौल बनाता है, खासकर पीटर सुचित्ज्की की सिनेमाटोग्राफी में, बहुत हद तक एल देजर्तो रोस्सो की शैली में| और ठीक उसी फिल्म की तरह, ऐसा जान पड़ता है कि विश्व के साथ संवाद स्थापित करने का हर प्रयास व्यक्तिगत पहचान को निर्धारित न कर पाने की अयोग्यता से पनपती है| क्या मैं मकड़ी हूँ? फिल्म के सबसे यादगार दृश्य में, मकड़ी अपने कमरे में जाले बुनता है, एक मानसिक मकडजाल जो उसके मस्तिष्क की भयानक कार्यशैली को दर्शाता है| बहरहाल, अपनी पहचान को निर्धारित करने की कठिन प्रक्रिया भी व्यर्थ ही साबित होती है| वह ईस्ट एंड की जड़ गलियों से होकर गुजरता है, अपने खोए हुए बचपन के ठंडे पुराने रास्ते से: विश्व के साथ उसके हर तरह के ताल्लुक टूट चुके हैं|

क्या मैं मकड़ी हूँ? मैं जिस पीड़ा का अनुभव करता हूँ वह मुझे अपने बचपन की स्मृतियों के भयंकर इलाके में ला पटकता है, एक ऐसी जगह जहाँ मैं खुद को सदैव प्यार करता रह सकता हूँ| लेकिन आखिरी वक्त में मैं यहाँ से भी पलायन कर जाता हूँ, एल देजर्तो रोस्सो में मोनिका विट्टी की कही गयी पंक्ति के सहारे, एक पंक्ति जो मेरे ईस्ट एंड जितनी ही खतरनाक है|

‘मेरे बाल मुझे तकलीफ दे रहे हैं|’


मैं भी अभी यही कह सकता हूँ| मकड़ी भी कहेगा| मकड़ी, जो जीवन में खोया हुआ भटक रहा है, नहीं जानता कि वो वह सब कुछ कर सकता है जो मैंने किया है, अपनी पहचान को दूसरे लोगों की स्मृतियों के सहारे पुनर्जीवित कर सकता है, वह एक अनोखी आवाज़ बन सकता है, एक बहुमुखी व्यक्तित्व और बंजारी प्रवृत्तियों वाला चरित्र बन सकता है| क्या मैं मकड़ी हूँ? मैं सिर्फ इतना जानता हूँ कि गर्मी का बदबूदार मौसम आ चुका है, और जैसा कि वह हमेशा करती है, बेल ऐसा व्यवहार कर रही है जैसे वह वह सब कुछ जानती हो जो मैं कर रहा हूँ – जो कह रहा हूँ, जो खा रहा हूँ, जो सोच रहा हूँ जो देख रहा हूँ जो पी रहा हूँ, सब कुछ – वह सब कुछ जो मैं खुद को उस खतरनाक उपनगर में खो देने के लिए कर रहा हूँ| 

2 comments:

  1. बहुत रचनात्मक लिख रहे हो, प्रमुख धारा में आना चाहिये,

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